Mahabharat Bheem
Mahabharat Bheem: भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे असाधारण व्यक्तित्व दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और शारीरिक सामर्थ्य के बल पर दो बिल्कुल विपरीत क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़े। अक्सर दर्शक पर्दे पर दिखने वाले सितारों को केवल उनके अभिनय कौशल से आंकते हैं, लेकिन कुछ कलाकारों के पीछे संघर्ष और गौरवशाली उपलब्धियों का एक ऐसा अध्याय होता है, जिससे आम जनमानस अक्सर अनभिज्ञ रहता है। एक ऐसी ही महान शख्सियत ने न केवल खेल के मैदानों पर भारत का तिरंगा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लहराया, बल्कि भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित पौराणिक पात्र को जीवंत कर खुद को अमर कर दिया। यह गाथा उस महानायक की है, जिसने सीमा सुरक्षा बल (BSF) से सफर शुरू कर एशिया के खेलों को जीता और फिर ‘भीम’ बनकर करोड़ों दिलों में बस गए।
प्रवीण कुमार सोबती का जन्म 6 दिसंबर 1947 को पंजाब के सरहाली कलां में हुआ था। प्रकृति ने उन्हें एक विशाल और प्रभावशाली कद-काठी से नवाजा था। इसी शारीरिक शक्ति के कारण वे मात्र 20 वर्ष की आयु में सीमा सुरक्षा बल (BSF) में भर्ती हो गए। सेना के अनुशासित वातावरण में रहते हुए, उनकी प्रतिभा को अधिकारियों ने पहचाना और उन्हें ‘डिस्कस थ्रो’ (चक्र क्षेपण) और ‘हैमर थ्रो’ जैसे कठिन खेलों में प्रशिक्षित होने के लिए प्रेरित किया। प्रवीण ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्द ही वे एक पेशेवर एथलीट के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर उभरकर सामने आए।
1960 और 1970 के दशक में प्रवीण कुमार सोबती भारतीय एथलेटिक्स का पर्याय बन चुके थे। उनकी शारीरिक क्षमता के आगे प्रतिद्वंद्वी पस्त नजर आते थे। 1966 के बैंकाक एशियाई खेलों में उन्होंने डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक और हैमर थ्रो में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उनकी सफलता का सिलसिला यहीं नहीं थमा; 1970 के एशियाई खेलों में उन्होंने पुनः डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी बादशाहत कायम रखी। इसके अलावा, उन्होंने 1966 के कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक और 1974 के एशियाई खेलों में पुनः रजत पदक अपने नाम किया। उन्होंने दो बार ओलंपिक खेलों में भी भारत का गौरवशाली नेतृत्व किया, जो उनके खेल कौशल का प्रमाण है।
खेलों से संन्यास लेने के बाद, उनके जीवन में एक नया मोड़ तब आया जब दिग्गज फिल्मकार बी.आर. चोपड़ा अपनी कालजयी कृति ‘महाभारत’ का निर्माण कर रहे थे। उन्हें ‘भीम’ के किरदार के लिए एक ऐसे अभिनेता की तलाश थी जिसकी काया भीमकाय हो परंतु स्वभाव में सौम्यता हो। 6 फीट 6 इंच लंबे प्रवीण कुमार इस भूमिका के लिए सर्वथा उपयुक्त पाए गए। उन्होंने इस किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि आज भी जब ‘गदाधारी भीम’ की कल्पना की जाती है, तो प्रवीण कुमार सोबती का ही चेहरा जेहन में आता है। उनकी संवाद अदायगी और बलशाली शरीर ने इस पौराणिक पात्र को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।
अभिनय की दुनिया के बाद, प्रवीण कुमार ने सार्वजनिक सेवा की भावना से राजनीति का रुख किया। साल 2013 में उन्होंने आम आदमी पार्टी के जरिए अपनी राजनीतिक पारी शुरू की और दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा। हालांकि, बाद में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। जीवन के अंतिम वर्षों में वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते रहे और साल 2022 में 74 वर्ष की आयु में इस महान खिलाड़ी और अभिनेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने के साथ ही भारतीय मनोरंजन और खेल जगत के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।
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