Crude Oil Price Rise: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के अशांत क्षेत्र में एक बार फिर भड़के सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए ताजा और भीषण हमलों के बाद वैश्विक कमोडिटी मार्केट में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में अचानक जोरदार उछाल देखने को मिला है।

सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार खुलते ही ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड दोनों की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की भारी तेजी दर्ज की गई। आर्थिक विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यदि दोनों देशों के बीच जमीनी हालात जल्द ही काबू में नहीं आए, तो आम जनता की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा और पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में एक बार फिर भारी बढ़ोतरी का दौर शुरू हो सकता है।

आसमान छूती कीमतें: 95 डॉलर प्रति बैरल के पार निकला अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड
ताजा वैश्विक कारोबारी सत्र के दौरान अमेरिकी क्रूड ऑयल (WTI) की कीमत 2.32 फीसदी की उछाल के साथ 92.64 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। वहीं दूसरी ओर, वैश्विक बेंचमार्क माना जाने वाला ब्रेंट क्रूड 2.5 प्रतिशत की भारी तेजी के साथ 95.42 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर ट्रेड करता हुआ दिखाई दिया। दरअसल, कुछ समय पहले ही इजरायल और लेबनान के बीच एक नाजुक युद्धविराम हुआ था, जिससे वैश्विक बाजारों को यह उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र में अब शांति बहाल होगी। हालांकि, इजरायल के नए हमलों ने इन सभी सकारात्मक उम्मीदों को करारा झटका दिया है। इसके चलते अब अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले संभावित शांति समझौते की राह भी बेहद कठिन हो गई है, जिससे निवेशकों में तेल की वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने का डर बैठ गया है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का गतिरोध: वैश्विक तेल परिवहन मार्ग पर मंडराया सबसे बड़ा खतरा
वैश्विक तेल बाजार के लिए इस वक्त सबसे संवेदनशील मुद्दा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) बना हुआ है, जिसे दुनिया के तेल व्यापार की जीवनरेखा कहा जाता है। दुनिया के कुल कच्चे तेल के परिवहन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा इस मार्ग पर लगाए गए विभिन्न प्रतिबंधों और सैन्य रुकावटों के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से ही काफी दबाव में चल रही है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रणनीतिक समुद्री मार्ग चल रहे युद्ध के कारण लंबे समय तक अवरुद्ध या बाधित रहता है, तो पूरी दुनिया के एनर्जी मार्केट में एक अभूतपूर्व और बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा, जिससे निपटना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होगा।
OPEC+ की रणनीति फेल: आपूर्ति बाधाओं के कारण उत्पादन बढ़ाने का फैसला बेअसर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से तेल निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक प्लस’ (OPEC+) ने हाल ही में बाजार में तेल उत्पादन बढ़ाने का एक बड़ा निर्णय लिया था। इसके बावजूद, वैश्विक बाजार और निवेशकों को इस फैसले से कोई खास राहत मिलती नहीं दिख रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि कई प्रमुख तेल उत्पादक देश अपनी आंतरिक तकनीकी और बुनियादी ढांचागत समस्याओं (सप्लाई बाधाओं) के चलते ओपेक द्वारा तय किए गए बढ़े हुए उत्पादन लक्ष्यों को पूरा करने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, बाजार में मांग की तुलना में कच्चे तेल की उपलब्धता लगातार कम बनी हुई है, जो कीमतों को नीचे नहीं आने दे रही।
भारत के लिए बड़ी आफत: महंगाई बढ़ने की आशंका और पेट्रोल-डीजल पर भारी दबाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की इस बेलगाम तेजी का सबसे सीधा और नकारात्मक असर भारत पर पड़ना तय है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर क्रूड महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे भारतीय मुद्रा और राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ेगा। इसका सीधा असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि के रूप में दिखेगा।
जब ईंधन महंगा होगा, तो माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ने से देश में चौतरफा महंगाई तेजी से पैर पसारेगी। गौरतलब है कि पिछले महज एक महीने के भीतर ही भारतीय तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की है, जिसके कारण देश के विभिन्न शहरों में ईंधन के दाम कुल मिलाकर 7.50 रुपये से लेकर 8 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं। यदि वैश्विक तनाव नहीं थमा, तो यह आंकड़ा और ऊपर जाएगा।
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