Dark Mode vs Light Mode : चाहे घर से काम करना हो या ऑफिस का डेस्क जॉब, आजकल के डिजिटल दौर में लोग अपना सबसे ज्यादा वक्त स्मार्टफोन, लैपटॉप या कंप्यूटर स्क्रीन के सामने ही बिताते हैं। हालांकि, तकनीक के साथ जुड़े रहने के अपने फायदे हैं, लेकिन लगातार और घंटों तक स्क्रीन को देखते रहने से आंखों पर इसका बेहद बुरा असर पड़ता है। लंबे समय तक डिस्प्ले के सामने बैठे रहने की वजह से आंखों में असमय थकान, सूखापन, धुंधलापन और लगातार जलन जैसी गंभीर समस्याएं होने लगती हैं। इन परेशानियों से बचने और आंखों को थोड़ा आराम देने के लिए आजकल बहुत से लोग अपने डिजिटल डिवाइसेज पर ‘डार्क मोड’ का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं।
आमतौर पर सभी स्मार्टफोन्स और कंप्यूटर में दो तरह के डिस्प्ले ऑप्शंस मिलते हैं। पहले विकल्प यानी ‘लाइट मोड’ में बैकग्राउंड पूरी तरह से सफेद या हल्के रंग का होता है, जिस पर काले या गहरे रंग के टेक्स्ट (शब्द) दिखाई देते हैं। इसके विपरीत, ‘डार्क मोड’ की तकनीक बिल्कुल उलट काम करती है; इसमें स्क्रीन का बैकग्राउंड पूरी तरह से काला या गहरा ग्रे हो जाता है और उसके ऊपर दिखने वाले टेक्स्ट का रंग सफेद या कोई अन्य हल्का रंग हो जाता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल डार्क या लाइट मोड को सेलेक्ट कर लेने भर से आंखों पर पड़ने वाला डिजिटल स्ट्रेस कम हो जाता है?
इस उलझन भरे सवाल का सीधा और सटीक जवाब यह है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई भी एक मोड दूसरे मोड से पूरी तरह बेहतर या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। इन दोनों ही मोड्स के अपने-अपने फायदे और कुछ नुकसान हैं, जो पूरी तरह से आपके आसपास मौजूद लाइटिंग (रोशनी) और खुद यूजर की आंखों की विजन क्षमता (नजर) पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति को ‘मायोपिया’ यानी दूर की नजर कमजोर होने की बीमारी है, तो उसके लिए स्क्रीन पर डार्क मोड एक्टिवेट करना फायदे के बजाय नुकसानदेह साबित हो सकता है क्योंकि इससे उसे अक्षरों को पढ़ने में ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी।
कम रोशनी वाले माहौल या अंधेरे कमरों में हमारी आंखों की पुतलियां प्राकृतिक रूप से फैल जाती हैं ताकि वे अधिक से अधिक प्रकाश को अंदर ले सकें। ऐसी स्थिति में अगर आप चमकदार लाइट मोड वाली स्क्रीन को लगातार देखेंगे, तो स्क्रीन और कमरे के बीच अत्यधिक कंट्रास्ट के कारण आंखों में तेज दर्द शुरू हो जाएगा। यहाँ डार्क मोड आपके बेहद काम आता है, जो स्क्रीन की चमक को कमरे की रोशनी के अनुकूल बनाकर आंखों को राहत देता है। इसके उलट, यदि कमरा पूरी तरह रोशनी से जगमगा रहा हो, तो हमारी पुतलियां सिकुड़ जाती हैं। तेज रोशनी में डार्क मोड ऑन रखने से टेक्स्ट पर फोकस करना मुश्किल हो जाता है और अक्षर ब्लर (धुंधले) दिखने लगते हैं।
अगर आप डार्क मोड के आदी नहीं हैं और लाइट मोड का ही इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो कुछ आसान और बेहद असरदार टिप्स अपनाकर अपनी आंखों को सुरक्षित रख सकते हैं। लाइट मोड का उपयोग करते समय सबसे पहले अपने डिवाइस की ब्राइटनेस (चमक) को थोड़ा कम कर दें, जिससे स्क्रीन से निकलने वाला ग्लेयर (चकाचौंध) काफी हद तक घट जाता है। आज के आधुनिक स्मार्टफोन्स में ‘ऑटो-ब्राइटनेस’ का बेहतरीन इन-बिल्ट फीचर आता है, जो बाहर और कमरे की रोशनी (एम्बिएंट लाइट) के हिसाब से स्क्रीन की चमक को खुद-ब-खुद एडजस्ट कर देता है।
लाइट मोड का सुरक्षित उपयोग करने के लिए आप अपने फोन या लैपटॉप में उपलब्ध ‘नाइट मोड’ या ‘आई कम्फर्ट’ शील्ड विकल्प को भी ऑन कर सकते हैं। यह खास फीचर स्क्रीन से निकलने वाली हानिकारक ‘ब्लू लाइट’ (नीली रोशनी) की मात्रा को बहुत कम कर देता है और स्क्रीन को एक हल्का पीलापन (वॉर्म टोन) देता है। यह पीली रोशनी आंखों के लिए बेहद आरामदायक होती है और इससे स्क्रीन को देर तक देखने के बाद भी आंखों में भारीपन महसूस नहीं होता। इसलिए, किसी भी एक मोड पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय माहौल की रोशनी के अनुसार अपने डिस्प्ले की सेटिंग्स को बदलते रहना ही सबसे समझदारी भरा फैसला है।
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