India AI Crisis
India AI Crisis : भारत के कॉरपोरेट जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन की रफ्तार जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी तेजी से कर्मचारियों का हुनर नहीं बदल पा रहा है। ‘एसएचआरएम (SHRM) इंडिया स्किल इंटेलिजेंस रिपोर्ट 2026’ के हालिया आंकड़ों ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की करीब 45 प्रतिशत कंपनियां इस समय एआई और आधुनिक डिजिटल स्किल्स की भारी कमी से जूझ रही हैं। तकनीकी विशेषज्ञों और मानव संसाधन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यदि भारतीय वर्कफोर्स को समय रहते नए दौर की तकनीक के अनुसार अपग्रेड नहीं किया गया, तो आने वाले समय में लाखों कामकाजी लोगों के सामने रोजगार का एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है।
एसएचआरएम की इस खुफिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एआई का सबसे पहला और घातक प्रहार बैक ऑफिस, डेटा मैनेजमेंट और कस्टमर सपोर्ट जैसी रूटीन नौकरियों पर होने वाला है। अगले तीन वर्षों के भीतर लगभग 28 प्रतिशत बैक ऑफिस से जुड़े रोल्स और 24 प्रतिशत डेटा एवं रिपोर्टिंग से जुड़ी नौकरियां पूरी तरह प्रभावित या समाप्त हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, एआई-संचालित चैटबॉट्स और ऑटोमेशन टूल्स के कारण 21 प्रतिशत कस्टमर सर्विस की नौकरियों पर भी सीधा असर पड़ेगा। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए देश के 198 से अधिक वरिष्ठ एचआर (HR) और लर्निंग लीडर्स से गहन चर्चा की गई थी। हालांकि, एसएचआरएम के ग्लोबल प्रेसिडेंट जॉनी सी. टेलर जूनियर का मानना है कि भारत के पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, जो सही दिशा मिलने पर वैश्विक स्तर पर डिजिटल टैलेंट कैपिटल बन सकती है।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू भारत में कामकाजी लोगों को मिलने वाली फॉर्मल (औपचारिक) ट्रेनिंग की बेहद खराब स्थिति है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल 2.3 प्रतिशत कर्मचारियों को ही काम के दौरान औपचारिक तकनीकी ट्रेनिंग मिल पाती है। इसके विपरीत, यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो यूनाइटेड किंगडम (UK) में 68 प्रतिशत, जर्मनी में 75 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में रिकॉर्ड 96 प्रतिशत कर्मचारियों को नियमित रूप से अपस्किल किया जाता है। भारत इस मामले में विकसित देशों से कोसों दूर खड़ा है, जिससे हमारी वर्कफोर्स की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है।
चिंता केवल ट्रेनिंग की कमी की नहीं है, बल्कि कंपनियों द्वारा अपनाए जा रहे गलत और पुराने ट्रेनिंग मॉडल की भी है। भारतीय कंपनियां अपने कुल बजट का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केवल पारंपरिक डिजिटल कोर्स और क्लासरूम थ्योरी पर बर्बाद कर रही हैं, जबकि असल दुनिया में काम आने वाली प्रैक्टिकल या हैंड्स-ऑन लर्निंग पर मात्र 3 प्रतिशत निवेश किया जा रहा है। विडंबना यह भी है कि केवल 34 प्रतिशत कंपनियां ही ऐसी हैं, जो अपने स्किलिंग प्रोग्राम से निकलने वाले परिणामों या कर्मचारियों की कार्यक्षमता में सुधार को वैज्ञानिक तरीके से मापती हैं, बाकी कंपनियां बिना किसी ठोस रणनीति के काम कर रही हैं।
भारतीय कॉरपोरेट जगत में एआई को पूरी तरह न अपना पाने के पीछे तकनीकी खामी नहीं, बल्कि नेतृत्व की दूरदर्शिता की कमी और निवेश पर मिलने वाले रिटर्न (ROI) को लेकर हिचकिचाहट है। करीब 54 प्रतिशत कंपनियों ने स्वीकार किया कि उनके शीर्ष प्रबंधन में एआई निवेश को लेकर गंभीरता का स्तर बेहद कम या मध्यम है, जबकि 44 प्रतिशत इसे एक बड़ी रुकावट मानते हैं। इसके साथ ही, 41 प्रतिशत कंपनियों में सस्टेनेबिलिटी और ग्रीन स्किल्स (पर्यावरणीय कौशल) की भी भारी कमी देखी गई है। एसएचआरएम के क्षेत्रीय सीईओ अचल खन्ना ने चेतावनी दी है कि भारत बदलाव के नाजुक मोड़ पर है और भविष्य सिर्फ उन्हीं कंपनियों का सुरक्षित है जो अपने कर्मचारियों के कौशल विकास में निवेश करेंगी।
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