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Delhi car blast case: मरने के बाद भी नहीं छूटा पीछा, नाम पर करोड़ों का खेल, कौन है अल-फलाह ग्रुप का असली चेहरा?

Delhi car blast case: दिल्ली कार ब्लास्ट मामले में हर दिन चौंकाने वाले नए खुलासे हो रहे हैं। इस जांच की कड़ी में, अब जमीन घोटाले से जुड़ी एक और विस्फोटक जानकारी सामने आई है। दरअसल, अल-फलाह ग्रुप के संस्थापक जवाद अहमद सिद्दीकी पर करोड़ों रुपये की कीमती जमीन को फर्जी कागजात के जरिए हथियाने का नया और गंभीर आरोप लगाया गया है। जवाद सिद्दीकी पहले से ही दिल्ली ब्लास्ट और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में हैं। इस नए खुलासे ने उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को और भी गंभीर बना दिया है।

Delhi car blast case: नकली GPA के जरिए हड़पी गई कीमती जमीन

अल-फलाह मामले से जुड़ी चल रही जांच में यह बात सामने आई है कि दिल्ली के मदनपुर खादर इलाके में खसरा नंबर 792 में स्थित कीमती जमीनों को जवाद अहमद सिद्दीकी से जुड़े तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन ने धोखे से हासिल किया था। यह धोखाधड़ी एक नकली जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के माध्यम से की गई थी। GPA एक ऐसा कानूनी दस्तावेज होता है जो किसी व्यक्ति को दूसरे की ओर से संपत्ति से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार देता है। जांच अधिकारियों ने पुष्टि की है कि यह GPA पूरी तरह से फर्जी था, जिसका इस्तेमाल धोखाधड़ी करने के लिए किया गया।

Delhi car blast case: सवाल: मरे हुए लोगों ने कैसे किए हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान?

अधिकारियों द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, यह विवादित जमीन साउथ दिल्ली में एक खास और प्राइम लोकेशन पर फैली हुई है। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिन लोगों के नाम पर इस नकली GPA में हस्ताक्षर (Signatures) और अंगूठे के निशान (Thumb Impressions) लगाए गए हैं, वे लोग सालों नहीं बल्कि दशकों पहले ही मर चुके थे।यह नकली जीपीए 7 जनवरी 2004 की तारीख का है। इसमें यह दावा किया गया है कि कई को-ओनर्स (सह-मालिकों) के अधिकार विनोद कुमार/पुत्र-भूले राम के पक्ष में हस्तांतरित (Transfer) किए गए थे। हैरानी की बात यह है कि इस GPA पर दिखने वाले सिग्नेचर और अंगूठे के निशान ऐसे लोगों के हैं जिनकी मौत बताई गई तारीख से काफी पहले ही हो चुकी थी।

1972 से 1998 के बीच मृत लोगों के नाम का इस्तेमाल

मिली जानकारी के अनुसार, 7 जनवरी 2004 को तैयार किए गए इस फर्जी GPA में कई ऐसे व्यक्तियों के नाम भी शामिल थे, जिनकी मृत्यु साल 1972 से लेकर 1998 के बीच ही हो गई थी। इसके बावजूद, इन सभी मृतकों को 2004 में ‘जमीन बेचने वाले’ के तौर पर दिखाया गया है, जो एक घोर कानूनी उल्लंघन है। एक अधिकारी ने इसे पूरी तरह फर्जी और अवैध दस्तावेज बताते हुए कहा कि “एक मृत व्यक्ति कभी भी GPA नहीं कर सकता है।”

फर्जी दस्तावेज से 75 लाख रुपये में बेची गई जमीन

इस फर्जी GPA के आधार पर, 27 जून 2013 को एक रजिस्टर्ड सेल डीड (Registered Sale Deed) तैयार की गई। इस डीड के माध्यम से जमीन को 75 लाख रुपये में तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन को ट्रांसफर करने का दावा किया गया। विनोद कुमार ने इस डीड पर कई को-ओनर्स के तौर पर हस्ताक्षर किए, जिनमें वे लोग भी शामिल थे जो बहुत पहले मर चुके थे।

उन्होंने मरे हुए लोगों के बिना बांटे हुए शेयर ऐसे बेचे, जैसे वे जिंदा हों और उनकी सहमती हो। पुलिस द्वारा की गई गहन जांच में यह सामने आया है कि सभी GPA फर्जी थे, और उनके फर्जी हस्ताक्षर बनाकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए थे। इन सभी धोखाधड़ी वाले कार्यों का सीधा और अंतिम फायदा तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन को मिला।

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