Delhi SIR News : दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें दोबारा फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है, जबकि पहले से पंजीकृत मतदाताओं के विवरण में बदलाव के लिए फॉर्म-8 का प्रावधान है।

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम हटने का मामला
दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, करीब 43 लाख लोगों के नाम हटाए जाने का मुद्दा सामने आया है। इनमें स्थानांतरित या अनुपस्थित श्रेणी के मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में स्पष्टता की कमी है।

अस्थायी अनुपस्थिति को स्थायी पलायन न माना जाए
सुनवाई में अदालत ने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति काम के सिलसिले में एक-दो महीने के लिए दिल्ली से बाहर जाता है, तो उसे स्थायी रूप से स्थानांतरित कैसे माना जा सकता है। दिल्ली में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर, दिहाड़ी कामगार और रेहड़ी-पटरी वाले रहते हैं। उनकी आवाजाही रोजगार पर निर्भर करती है। अदालत की चिंता है कि अस्थायी अनुपस्थिति के कारण पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर न हो जाएं।
फॉर्म नहीं मिलने वाले मतदाताओं का क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों की स्थिति पर भी सवाल उठाया, जो अपने पुराने पते पर ही रह रहे हैं, लेकिन उन्हें गणना फॉर्म नहीं मिला या वे इसे जमा नहीं कर सके। अदालत ने यह जानना चाहा कि ऐसी स्थिति में मतदाताओं को सूची में अपना नाम बनाए रखने का अवसर कैसे मिलेगा। प्रक्रिया में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे फॉर्म नहीं मिलने या तकनीकी चूक का नुकसान पात्र मतदाता को न उठाना पड़े।
समयसीमा बढ़ाने पर विचार करेगा चुनाव आयोग
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने बताया कि वह देर से जमा किए गए गणना फॉर्म स्वीकार करने के विकल्प पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समयसीमा बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है। अदालत ने आयोग से संबंधित मुद्दों पर दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा है। अंतिम निर्णय और समयसीमा में किसी बदलाव की पुष्टि आधिकारिक आदेश से ही होगी।

मतदाताओं तक पहुंचने की जिम्मेदारी आयोग की भी
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब दिल्ली में निकट भविष्य में चुनाव प्रस्तावित नहीं हैं, तो समयसीमा को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों है। सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि पूरी जिम्मेदारी मतदाताओं पर नहीं छोड़ी जा सकती। आयोग को जरूरतमंद मतदाताओं तक पहुंचने और उन्हें प्रक्रिया की जानकारी देने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए।
हटाए गए नामों की सूची सरल भाषा में उपलब्ध कराने की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की जानकारी आसान भाषा में उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी ध्यान दिलाया। सूची और नोटिस इस तरह होने चाहिए कि आम नागरिक उन्हें आसानी से समझ सकें। अदालत ने तार्किक विसंगतियों और संदर्भ मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर भी विचार किया। इन मुद्दों पर कानूनी स्थिति अभी पूरी तरह अंतिम नहीं मानी जा सकती।
अब आयोग की रिपोर्ट पर नजर
दिल्ली SIR मामले में मुख्य चिंता यह है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम केवल फॉर्म नहीं मिलने, तकनीकी गलती या समयसीमा चूकने के कारण बाहर न रह जाए। अब चुनाव आयोग की रिपोर्ट और आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही से स्पष्ट होगा कि प्रभावित मतदाताओं के लिए क्या समाधान सामने आता है।
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