Delimitation Bill : परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की वरिष्ठ सांसद सुप्रिया सुले के एक बयान ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। सुले ने संकेत दिया है कि यदि केंद्र सरकार लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि और 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार होती है, तो उनकी पार्टी विधेयक पर सकारात्मक रुख अपना सकती है। 20 जुलाई से प्रारंभ होने वाले आगामी मानसून सत्र में सरकार 130वें और 131वें संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने की पुरजोर कोशिश करेगी। चूंकि संविधान में किसी भी बदलाव के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य होता है, इसलिए सरकार के लिए जादुई आंकड़े तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

लोकसभा में संख्या बल और सत्ता पक्ष का गणित
लोकसभा में प्रभावी सदस्य संख्या 540 के आधार पर, संविधान संशोधन के लिए 360 मतों की आवश्यकता होगी। वर्तमान में एनडीए के पास 324 सांसद हैं, जिसका अर्थ है कि सरकार को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कम से कम 36 अतिरिक्त वोटों की दरकार है। इस गणित को सुलझाने के लिए सत्ता पक्ष विपक्षी दलों के उन सांसदों पर अपनी पैनी नजर रखे हुए है, जो या तो सरकार का समर्थन कर सकते हैं या फिर मतदान के दौरान सदन से अनुपस्थित रह सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी, आरजेडी, एनसीपी (शरद पवार गुट), जेएमएम, आप और नेशनल कॉन्फ्रेंस के रुख पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है। सुप्रिया सुले का संकेत इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट नहीं है और राजनीतिक सौदेबाजी की संभावना बनी हुई है।

डीएमके की भूमिका: सरकार के लिए निर्णायक कड़ी
परिसीमन के इस ‘नंबर गेम’ में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं। यदि यह पार्टी सरकार के समर्थन में आती है, तो एनडीए का आंकड़ा 354 तक पहुंच जाएगा, जो कि 360 के बहुमत से महज छह कदम दूर होगा। इसके अलावा, यदि डीएमके मतदान से दूरी बना लेती है, तो सदन की प्रभावी संख्या कम हो जाएगी, जिससे दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी स्वतः नीचे आ जाएगा। ऐसी स्थिति में, डीएमके का स्टैंड सरकार के लिए ‘किंगमेकर’ साबित हो सकता है। सरकार न केवल समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है, बल्कि कुछ दलों को तटस्थ रहने के लिए भी मनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
राज्यसभा में सरकार की तुलनात्मक स्थिति और भविष्य की राह
राज्यसभा में सरकार की स्थिति लोकसभा के मुकाबले कुछ अधिक सहज नजर आ रही है। बंगाल की रिक्त सीटों पर होने वाले उपचुनावों के बाद एनडीए समर्थित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की संभावना है, जिससे उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि, यहाँ भी डीएमके के आठ सदस्य सरकार के गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। मानसून सत्र केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संख्या बल और रणनीतिक गठबंधन की एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। विपक्ष के भीतर सेंध लगाने और अनुकूल वोटिंग सुनिश्चित करने की सरकार की जुगत ने मानसून सत्र को रोमांचक और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
Read More: West Bengal Politics : ममता सरकार के फैसले पर फिर पलटा, सुवेंदु अधिकारी ने की मीरा की सुरक्षा बहाल












