Dhole Hunting
Dhole Hunting: कुत्ता एक वफादार पालतू जानवर है, यह हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुत्तों के प्यारे वीडियो और उनके प्रति लोगों की दीवानगी जगजाहिर है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कुत्तों की एक ऐसी प्रजाति भी है जो इतनी खूंखार है कि जंगल के बड़े-बड़े शिकारी भी उनसे दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं? हम बात कर रहे हैं ‘जंगली कुत्तों’ की, जिन्हें ‘सोनकुत्ता’ या ‘ढोल’ (Dhole) के नाम से भी जाना जाता है। हाल ही में मध्य प्रदेश के देवास जिले में इन दुर्लभ शिकारियों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जो प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण के लिए एक क्रांतिकारी संकेत माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश के वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन के इतिहास में गुरुवार का दिन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज हो गया। देवास जिले के खेओनी वाइल्डलाइफ सेंचुरी में पहली बार दो जंगली कुत्तों को देखा गया है। सेंचुरी के कैमरा ट्रैप और गश्ती दल ने इन दुर्लभ जानवरों की पुष्टि की है। इंदौर और उज्जैन संभाग के आसपास के क्षेत्रों में इन शिकारियों का दिखना बेहद दुर्लभ माना जाता है। इस खबर के सामने आते ही वन विभाग के अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रकृति प्रेमियों के बीच उत्साह और खुशी की लहर दौड़ गई है।
देवास के डीएफओ (DFO) अमित सिंह ने इन जंगली कुत्तों की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये जानवर अपनी बेहतरीन शिकार क्षमता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। ये बाघ या तेंदुए की तरह अकेले शिकार करना पसंद नहीं करते, बल्कि एक सुनियोजित झुंड (Pack) में हमला करते हैं। झुंड में होने के कारण ये इतने ताकतवर हो जाते हैं कि बड़े शिकारियों से उनका शिकार तक छीन लेते हैं। इनकी सबसे खूंखार बात यह है कि ये अपने शिकार के मरने का इंतजार नहीं करते, बल्कि उसे जिंदा ही खाना शुरू कर देते हैं। अपनी इसी चालाकी और आक्रामकता की वजह से इन्हें जंगल का सबसे सफल शिकारी माना जाता है।
वाइल्डलाइफ विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी जंगल में जंगली कुत्तों या ‘ढोल’ की मौजूदगी उस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के स्वस्थ होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। ढोल वहीं पाए जाते हैं जहाँ उनके लिए पर्याप्त मात्रा में छोटे और मध्यम आकार के शाकाहारी जानवर (Prey base) उपलब्ध हों। खेओनी सेंचुरी में इनका दिखना यह साबित करता है कि यहाँ का वन्यजीव प्रबंधन सही दिशा में है और यहाँ जैव-विविधता फल-फूल रही है। यह सेंचुरी अब केवल तेंदुओं और हिरणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहाँ एक जटिल और समृद्ध खाद्य श्रृंखला विकसित हो रही है।
वर्तमान में जंगली कुत्तों का प्रजनन काल (Breeding Season) चल रहा है। ऐसे में वन विभाग के लिए यह शोध का विषय बन गया है कि क्या ये कुत्ते केवल भटकते हुए यहाँ आए हैं या उन्होंने खेओनी को अपना स्थायी घर बना लिया है। अगर ये यहाँ अपना कुनबा बढ़ाते हैं, तो यह मध्य प्रदेश के पर्यटन और वन्यजीव मानचित्र पर इस सेंचुरी का कद और बढ़ा देगा। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, प्रदेश के कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच टाइगर रिजर्व में तो ढोल पाए जाते हैं, लेकिन इंदौर-उज्जैन बेल्ट में इनकी सक्रियता न के बराबर रही है।
वन विभाग इन नए मेहमानों की सुरक्षा और उनकी गतिविधियों को समझने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। डीएफओ के निर्देशन में पूरे क्षेत्र में आधुनिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं और वन रक्षकों की विशेष टीम नियमित गश्त कर रही है। विभाग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इन दुर्लभ शिकारियों को किसी भी प्रकार की मानवीय दखल का सामना न करना पड़े। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो पाएगा कि खेओनी के जंगलों में इन ‘खूंखार शिकारी कुत्तों’ का भविष्य कैसा होगा।
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