Dr. Rajendra Death Anniversary
Dr. Rajendra Death Anniversary : भारतीय लोकतंत्र की नींव को अपने आदर्शों से सींचने वाले भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की आज पुण्यतिथि है। बिहार की माटी से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने वाले राजेंद्र बाबू का जीवन सादगी, त्याग और अटूट देशभक्ति की एक अनुपम गाथा है। उन्हें ‘देशरत्न’ और ‘अजातशत्रु’ जैसे अलंकरणों से नवाजा गया, क्योंकि उनका कोई शत्रु नहीं था और उनका हृदय केवल जनसेवा के लिए धड़कता था। आज पूरा देश उनकी स्मृति में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।
राजेंद्र बाबू बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। उनकी मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार उनकी परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका देखकर परीक्षक भी दंग रह गए थे। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि परीक्षक ने उनकी कॉपी पर टिप्पणी लिखी थी— “The examinee is better than the examiner” (परीक्षार्थी, परीक्षक से बेहतर है)। वकालत के क्षेत्र में वे उस दौर के सबसे सफल वकीलों में गिने जाते थे, लेकिन महात्मा गांधी के एक आह्वान पर उन्होंने अपनी जमी-जमाई वकालत और सुख-सुविधाओं का त्याग कर स्वतंत्रता संग्राम के कठिन मार्ग को चुन लिया।
स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव की कहानी भी अत्यंत रोचक है। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी देश के पहले राष्ट्रपति बनें, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल और कांग्रेस के अधिकांश नेता राजेंद्र बाबू की सादगी और उनकी प्रशासनिक योग्यता के पक्षधर थे। अंततः सर्वसम्मति बनी और 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद निर्विरोध रूप से स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति चुने गए। यह उनके व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि उन्होंने इस गरिमामयी पद की मर्यादा को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
राजेंद्र बाबू ने राष्ट्रपति भवन के वैभव के बीच भी अपनी सादगी को कभी कम नहीं होने दिया। जब वे राष्ट्रपति बने, तब उनका वेतन 10,000 रुपये और भत्ता 2,500 रुपये तय किया गया था। उन्होंने इसे बहुत अधिक मानते हुए स्वेच्छा से अपना वेतन घटाकर मात्र 2,500 रुपये कर दिया। 340 कमरों वाले विशाल राष्ट्रपति भवन में वे केवल तीन कमरों का उपयोग करते थे। उनका मानना था कि एक गरीब देश के राष्ट्रपति को विलासिता का प्रदर्शन शोभा नहीं देता।
स्वदेशी और खादी उनके जीवन के अभिन्न अंग थे। राष्ट्रपति भवन में व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वे प्रतिदिन चरखा कातना कभी नहीं भूलते थे। उनकी संवेदनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब उनकी पौत्री शशि का विवाह तय हुआ। राजेंद्र बाबू ने कन्यादान के लिए बाजार से कोई कीमती उपहार खरीदने के बजाय, खुद अपने हाथों से सूत कातकर एक सुंदर खादी की साड़ी तैयार की। यह घटना उनके सरल और भावुक हृदय का जीवंत प्रमाण है।
वे सही मायनों में ‘जनता के राष्ट्रपति’ थे। उन्होंने देश के सुदूर इलाकों में बसे गरीबों और किसानों के दर्द को समझने के लिए लंबी रेल यात्राएं कीं। रिटायरमेंट के बाद वे किसी आलीशान बंगले के बजाय पटना के सदाकत आश्रम में एक साधारण खपरैल के मकान में रहने चले गए। 28 फरवरी 1963 को इसी सादगी के साथ इस महान विभूति ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका जीवन आज भी भारतीय राजनीति के लिए एक नैतिक दिशा-निर्देश की तरह है।
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