Opposition vs EC: चुनाव आयोग ने विपक्ष की ‘मशीन रीडेबल डेटा’ मांग खारिज की, जानिए क्या है पूरा मामला

Opposition vs EC : कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग से ‘मशीन रीडेबल डेटा’ (Machine Readable Data) की मांग किए जाने पर अब आयोग ने स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों की इस मांग को नियमों के खिलाफ बताते हुए खारिज कर दिया है।

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चुनाव आयोग के अनुसार, वर्तमान नियमों के तहत राजनीतिक दलों को मतदाता सूची की हार्ड कॉपी और पेन ड्राइव में सॉफ्ट कॉपी दी जाती है, जो पूरी तरह वैध और पारदर्शी प्रक्रिया है। लेकिन विपक्ष द्वारा मांगे जा रहे मशीन रीडेबल फॉर्मेट — जैसे कि Excel या CSV फॉर्मेट — आयोग के नियमों में शामिल नहीं हैं।

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मशीन रीडेबल डेटा क्यों है विवाद का विषय?

मशीन रीडेबल डेटा वह होता है जिसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर आसानी से पढ़ और प्रोसेस कर सकते हैं। इसमें डेटा को डिजिटल रूप में संरचित किया जाता है, जिससे बड़े स्तर पर विश्लेषण, खोज और तुलना संभव होती है। विपक्षी दलों का तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और मतदाता सूची में गड़बड़ी या दोहराव को आसानी से पकड़ा जा सकेगा।

हालांकि, चुनाव आयोग की चिंता कुछ और है। आयोग का कहना है कि अगर पूरी मतदाता सूची को मशीन रीडेबल फॉर्मेट में उपलब्ध कराया गया, तो इसमें छेड़छाड़ की आशंका बढ़ सकती है। साथ ही इससे मतदान के दिन मतदाताओं के बीच भ्रम और अफवाहें फैलने की भी संभावना बन सकती है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

आयोग के मुताबिक “मशीन रीडेबल डेटा प्रदान करने से मतदाता सूची में बदलाव किए जा सकते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।”आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन उसकी प्राथमिकता चुनाव प्रक्रिया की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।

विपक्ष का रुख

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का दावा है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें अधिक आधुनिक और डिजिटल डेटा तक पहुंच मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि इससे चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बढ़ेगा और जनता को सही जानकारी मिल पाएगी। चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच यह टकराव एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है क्या पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच संतुलन संभव है? आयोग फिलहाल परंपरागत तरीकों को प्राथमिकता दे रहा है, वहीं विपक्ष डिजिटल युग के अनुरूप सुधार की मांग कर रहा है।

इस मामले में आगे क्या होता है, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन फिलहाल चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि मशीन रीडेबल डेटा की मांग नियमों के तहत स्वीकार नहीं की जा सकती।

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