Ambikapur News : मैनपाट महोत्सव 2026 इस बार अपने ही रंगों से खाली नज़र आया। जिस आयोजन को सरगुजा की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन आकर्षण का प्रतीक माना जाता रहा है, वही इस वर्ष उत्साहहीन माहौल का गवाह बना। कार्यक्रम स्थल पर खाली पड़ी कुर्सियाँ और सुस्त भीड़ ने साफ संकेत दिया कि इस बार तैयारियों और जनसंपर्क में कहीं न कहीं बड़ी कमी रह गई।
हर वर्ष मैनपाट महोत्सव से पहले प्रशासनिक अमले में जिस तरह की हलचल और सक्रियता देखी जाती थी, वह इस बार नदारद रही। प्रचार-प्रसार सीमित रहा और आयोजन को लेकर व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास भी कमजोर दिखे। परिणामस्वरूप, पहले दो दिनों में ही भीड़ का अभाव साफ दिखाई देने लगा। तीसरे और अंतिम दिन भी माहौल में खास बदलाव नहीं आया।
इस बार कार्यक्रम स्थल पर पहले की तुलना में छोटा डोम बनाया गया था। उम्मीद थी कि सीमित व्यवस्था में भी दर्शक संख्या संतोषजनक रहेगी, लेकिन तस्वीर उलट दिखी। आम दर्शकों की कुर्सियाँ तो दूर, वीवीआईपी के लिए आरक्षित सीटें भी खाली नजर आईं। यह दृश्य आयोजन की वास्तविक स्थिति बयां करने के लिए पर्याप्त था।
जानकारों का मानना है कि स्थानीय कलाकारों को अपेक्षित महत्व न देना भी फीकेपन की बड़ी वजह बनी। मैनपाट महोत्सव की पहचान हमेशा स्थानीय संस्कृति, लोकनृत्य और क्षेत्रीय प्रतिभाओं से जुड़ी रही है। इस बार बाहरी प्रस्तुतियों को प्राथमिकता दिए जाने से स्थानीय कलाकारों और उनके समर्थकों में निराशा देखी गई, जिसका असर भीड़ पर भी पड़ा।
शासन के जनसंपर्क विभाग की सक्रियता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले दो दिनों से मंच की औपचारिक तस्वीरें तो जारी की गईं, लेकिन आम जनता की सहभागिता दर्शाने वाली तस्वीरें सामने नहीं आ सकीं। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि आयोजन में अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल पाया। प्रिंट, इलेक्ट्रिक और सोशल मीडिया ने भी इस बार आयोजन से पर्याप्त दूरी बना रखी थी।
सरगुजा, जो प्रदेश के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल का गृह जिला है, वहां आयोजित इस महोत्सव का फीका पड़ना राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय बन गया है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठने लगे हैं कि जनता अब केवल सांस्कृतिक आयोजनों से संतुष्ट नहीं है? वह बुनियादी समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता दे रही है।
मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि महज नाच-गाने से अब जनभावनाएं नहीं बदली जा सकतीं। रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं लोगों की प्राथमिकता में हैं। ऐसे में यदि प्रशासनिक तैयारी और जनसंवाद मजबूत न हो, तो बड़े से बड़ा आयोजन भी भीड़ जुटाने में असफल हो सकता है।
मैनपाट महोत्सव 2026 ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि जनता की अपेक्षाएं बदल रही हैं। अब आयोजनों की सफलता केवल भव्य मंच या औपचारिक घोषणाओं से तय नहीं होगी, बल्कि वास्तविक जनभागीदारी और भरोसे से तय होगी।
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