Forest Lament : छत्तीसगढ़ के सरगुजा के घने जंगलों और प्राकृतिक धरोहर पर खनन परियोजनाओं के बढ़ते प्रभाव को लेकर क्षेत्र में चिंता और असंतोष का माहौल लगातार गहराता जा रहा है। जंगलों की कटाई और पर्यावरणीय बदलावों को लेकर आम नागरिकों से लेकर कलाकारों तक में गहरी संवेदनाएं देखने को मिल रही हैं। सरगुजा की माटी और संस्कृति से जुड़े लोग अपने-अपने तरीके से इस पीड़ा को अभिव्यक्त कर रहे हैं।

इसी कड़ी में सरगुजा के प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल पांडेय ने जंगलों के संरक्षण और प्रकृति के प्रति अपने भावों को गीत के माध्यम से स्वर दिया है। उन्होंने स्वयं गीत की रचना की, उसे संगीतबद्ध कर गाया तथा आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए एआई आधारित एक फिल्म भी तैयार की है। यह गीत और फिल्म सोशल मीडिया पर तेजी से लोगों तक पहुंच रही है और इसे देखने-सुनने वाले अनेक सरगुजावासी अपनी भावनाओं को इससे जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं।

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सरगुजा के उदयपुर क्षेत्र तथा रामगढ़ पर्वत क्षेत्र में खनन गतिविधियों को लेकर पहले से ही विभिन्न स्तरों पर विरोध के स्वर उठते रहे हैं। हाल के समय में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई के बाद पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहस और तेज हो गई है। क्षेत्र के अनेक नागरिकों का मानना है कि जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सरगुजा की पहचान, संस्कृति और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
लोकगायक गोपाल पांडेय का कहना है कि यह गीत किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि जंगलों और प्रकृति के प्रति अपने प्रेम तथा चिंता को व्यक्त करने का प्रयास है। उनके अनुसार सरगुजा के जंगलों ने यहां की संस्कृति, लोकजीवन और परंपराओं को सदियों से संजोकर रखा है, इसलिए उनका संरक्षण सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
पर्यावरण और जंगलों को लेकर चल रही इस बहस के बीच कलाकारों की यह पहल चर्चा का विषय बनी हुई है। गीत और एआई फिल्म के माध्यम से सरगुजा के जंगलों का दर्द अब लोगों के दिलों तक पहुंच रहा है और प्रकृति संरक्षण के सवाल को नए ढंग से सामने ला रहा है।











