Garuda Purana: सनातन हिंदू धर्म में मानव जीवन को अनुशासित, सुसंस्कृत और मर्यादित बनाने के लिए कुल 16 महत्वपूर्ण संस्कारों का बहुत ही विस्तृत वर्णन मिलता है। इन सभी सोलह संस्कारों में अंतिम संस्कार को सबसे अंतिम और अत्यधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। यह पवित्र संस्कार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात पूरी धार्मिक विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब यह अंतिम संस्कार सही नियमों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है, तभी दिवंगत आत्मा को वास्तविक शांति की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, इस संस्कार के बाद ही आत्मा का मृत शरीर और इस मृत्युलोक से मोह पूरी तरह से समाप्त होता है, और वह यमलोक की लंबी यात्रा के लिए प्रस्थान करती है। वहां आत्मा को उसके जीवनभर के अच्छे और बुरे कर्मों के हिसाब से विभिन्न योनियों में नया पुनर्जन्म प्राप्त होता है।

गरुड़ पुराण में निहित अंतिम संस्कार से जुड़े जरूरी नियम और मान्यताएं
हमारे धार्मिक ग्रंथों में शामिल गरुड़ पुराण अठारह महापुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुराण माना जाता है। इस प्रसिद्ध पुराण में मृत्यु के बाद होने वाले अंतिम संस्कार को लेकर कई सारी जरूरी बातें, नियम और मार्गदर्शन बताए गए हैं। अक्सर लोगों के मन में यह एक बड़ा सवाल और दुविधा बनी रहती है कि क्या कोई दामाद अपने ससुर का अंतिम संस्कार कर सकता है या नहीं, और क्या उसे ऐसा करने का कोई धार्मिक अधिकार प्राप्त है? आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से जानते हैं कि इस विषय को लेकर पवित्र गरुड़ पुराण में क्या नियम और प्रावधान बताए गए हैं।

गरुड़ पुराण के अनुसार कौन कर सकता है मृतक का अंतिम संस्कार?
गरुड़ पुराण के नियमों के अनुसार, आमतौर पर किसी भी मृतक व्यक्ति के अंतिम संस्कार का अधिकार उसके सबसे निकटतम पुरुष सगे-सम्बन्धियों को ही दिया जाता है, जैसे कि उसका पुत्र, पोता या फिर भाई। प्राचीन समय की बात करें तो केवल मृतक के पुत्र को ही मुखाग्नि देने का एकमात्र अधिकार माना जाता था। उस दौर में बेटियों को भी पिता को मुखाग्नि देने का अधिकार प्राप्त नहीं था। जहां तक बात दामाद की है, तो गरुड़ पुराण के अनुसार पारंपरिक रूप से दामाद को अपने ससुर का अंतिम संस्कार करने का कोई अधिकार नहीं होता है।
आखिर दामाद क्यों नहीं कर सकता ससुर का अंतिम संस्कार? जानिए कारण
दामाद द्वारा ससुर का अंतिम संस्कार न किए जाने के पीछे मुख्य रूप से सामाजिक, धार्मिक और गोत्र से जुड़ी मान्यताएं जिम्मेदार हैं। हिंदू परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार आज भी विवाह के बाद बेटी को पराया धन माना जाता है। यह धार्मिक मान्यता है कि कन्यादान संपन्न होने के बाद बेटी का पारिवारिक संबंध उसके पिता के कुल से हटकर उसके पति के कुल और गोत्र से जुड़ जाता है। इस मुख्य वजह से दामाद को मृतक के मूल और प्रत्यक्ष परिवार का हिस्सा नहीं माना जाता है, और उसे इस धार्मिक और पारंपरिक कर्तव्य से दूर रखा जाता है।
बदलते समय के साथ समाज में आ रहे बदलाव और अपवादस्वरूप स्थितियां
हालांकि, अब आधुनिक समय के साथ-साथ समाज में सोच और परिस्थितियों में काफी बदलाव आ रहा है, और कई स्थानों पर पुरानी रूढ़ियां टूट रही हैं। यदि किसी परिवार में कोई पुत्र या अन्य निकटवर्ती पुरुष संबंधी मौजूद न हो, तो आज के समय में कई समुदायों और परिवारों में विशेष परिस्थितियों के तहत दामाद को अंतिम संस्कार करने और मुखाग्नि देने की अनुमति दी जाती है, हालांकि ऐसी घटनाएं अभी भी बहुत सीमित रूप में ही देखने को मिलती हैं।
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