Gauhati High Court : असम में नागरिकता से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहान की खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अमीनुल हक द्वारा पेश किए गए 16 दस्तावेज उनकी भारतीय नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने ‘फॉरेनर्स एक्ट, 1946’ (अधिसूचना में त्रुटिवश 1964 उल्लेखित) की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की नागरिकता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तो यह जिम्मेदारी पूरी तरह से उसी व्यक्ति पर होती है कि वह ठोस सबूतों के साथ यह सिद्ध करे कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारत का नागरिक है।

16 दस्तावेजों की फेहरिस्त भी नहीं आई काम
याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने अपनी नागरिकता के समर्थन में साक्ष्यों का एक बड़ा पुलिंदा कोर्ट के समक्ष रखा था। इनमें 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) की प्रति, जिसमें उनके दादा-दादी और पिता का नाम दर्ज था, के साथ-साथ 1966 से 2017 तक की मतदाता सूचियों की प्रमाणित प्रतियां शामिल थीं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 1973 के जमीन खरीद-बिक्री के दस्तावेज, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र (EPIC) और स्कूल के शैक्षणिक प्रमाण-पत्र भी प्रस्तुत किए थे। बावजूद इसके, हाई कोर्ट ने इन दस्तावेजों को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि ये साक्ष्य ‘फॉरेनर्स एक्ट’ के तहत निर्धारित कानूनी मानकों को पूरा करने में असफल रहे हैं।

मौखिक गवाही और पारिवारिक संबंधों की प्रामाणिकता पर कोर्ट का रुख
इस मामले में याचिकाकर्ता ने न केवल कागजी दस्तावेज बल्कि अपने पिता की मौखिक गवाही का सहारा भी लिया था। अमीनुल हक के पिता ने कोर्ट में उपस्थित होकर उन्हें अपना बेटा होने की पुष्टि की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बिना किसी ठोस और प्रासंगिक दस्तावेजी साक्ष्य के, केवल मौखिक गवाही से पिता-पुत्र के संबंधों को सिद्ध नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, कानूनी प्रक्रिया में संबंधों को स्थापित करने के लिए भी पुख्ता रिकॉर्ड की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में स्पष्ट नहीं हो सका। यह मामला मूल रूप से 28 फरवरी 2019 को कामरूप फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा हक को ‘विदेशी’ घोषित किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर की गई अपील से संबंधित था।
एनआरसी की स्थिति और अवैध प्रवासियों पर कानूनी बहस
असम में एनआरसी (NRC) की प्रक्रिया 2019 में पूर्ण हो चुकी थी, जिसे भारतीय नागरिकों और अवैध प्रवासियों के बीच अंतर करने के मुख्य दस्तावेज के रूप में देखा गया था। हालांकि, इसे अभी तक आधिकारिक रूप से नोटिफाई नहीं किया गया है, जिसके कारण ऐसे मामले कानूनी उलझनों का केंद्र बने हुए हैं। याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने बताया था कि वे गरीबी के कारण गुवाहाटी में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। बहरहाल, हाई कोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नागरिकता के दावों के लिए मात्र दस्तावेजों की संख्या मायने नहीं रखती, बल्कि उनकी कानूनी प्रामाणिकता और श्रृंखला का जुड़ाव अनिवार्य है। कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो अपनी नागरिकता सिद्ध करने हेतु दस्तावेजों की कानूनी कड़ी को जोड़ने में असमर्थ रहते हैं।











