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Greenland Not For Sale: ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर,  राजधानी नूक में फूटा जनता का गुस्सा, पीएम ने किया मार्च

Greenland Not For Sale: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर अधिकार करने की मंशा जाहिर करने के बाद उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुँच गया है। ट्रंप की इस “जबरदस्ती” वाली कूटनीति के खिलाफ जहाँ यूरोपीय देश और नाटो (NATO) सदस्य एकजुट हो गए हैं, वहीं ग्रीनलैंड की स्थानीय जनता में भी भारी उबाल देखा जा रहा है। बीते दिन राजधानी नूक (Nuuk) की सड़कों पर हजारों की संख्या में लोग एकत्र हुए और अमेरिकी सरकार की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि ग्रीनलैंड कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा जा सके, बल्कि यह एक गौरवशाली पहचान वाला देश है।

प्रधानमंत्री नीलसन ने संभाली कमान: अमेरिकी वाणिज्य दूतावास तक निकाला मार्च

ग्रीनलैंड के लोगों के इस विरोध को उस वक्त और मजबूती मिली जब स्वयं प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने इस मार्च की अगुवाई की। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी कॉन्सुलेट (वाणिज्य दूतावास) तक विशाल मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी विशेष रूप से उस निर्माणाधीन ब्लॉक के बाहर एकत्रित हुए, जहाँ अमेरिका अपने दूतावास को शिफ्ट करने की योजना बना रहा है। फिलहाल अमेरिका का काम एक अस्थायी लकड़ी की इमारत से चलता है। प्रधानमंत्री नीलसन ने दो टूक शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल यहाँ की जनता करेगी, वाशिंगटन नहीं।

भू-राजनीतिक महत्व: क्यों ग्रीनलैंड को हथियाना चाहता है अमेरिका?

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक बनाती है। यह अमेरिका और यूरोप की सीमा पर स्थित है और इसका एक सिरा रूस के करीब है। रूस वर्तमान में आर्कटिक के रास्ते ग्रीनलैंड होते हुए चीन तक अपने कच्चे तेल की सप्लाई करता है। इस क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड दुर्लभ खनिज पदार्थों और ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ का विशाल भंडार है। अमेरिका को डर है कि अगर उसने इस पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन यहाँ अपना प्रभाव बढ़ा लेंगे।

सुरक्षा का हवाला और कब्जे की धमकी: ट्रंप का ‘बल प्रयोग’ वाला बयान

ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य मानता है। अमेरिका की योजना ग्रीनलैंड को अपना एक नया राज्य बनाकर वहाँ विशाल सैन्य बेस स्थापित करने की है। अतीत में भी अमेरिका ने इसे खरीदने की असफल कोशिशें की थीं, लेकिन इस बार ट्रंप का रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि कूटनीतिक तरीके से बात नहीं बनी, तो अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए बल प्रयोग (Force) करने से भी पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है।

यूरोपीय देशों की एकजुटता: ग्रीनलैंड में सैन्य कर्मियों की तैनाती

ट्रंप की धमकियों को देखते हुए डेनमार्क, जिसके पास वर्ष 1700 से ग्रीनलैंड का प्रशासनिक नियंत्रण है, ने यूरोपीय सहयोगियों से मदद मांगी है। डेनमार्क के अनुरोध पर कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में अपने सैन्य कर्मियों को तैनात करना शुरू कर दिया है। नाटो सदस्य देश इस मुद्दे पर अमेरिका के खिलाफ एकजुट खड़े नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि किसी भी देश की संप्रभुता का इस तरह उल्लंघन करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का मजाक उड़ाना है। ग्रीनलैंड की बर्फीली वादियों में अब कूटनीतिक युद्ध के साथ-साथ सैन्य हलचल भी बढ़ गई है।

भविष्य की अनिश्चितता: क्या टलेगा अमेरिका के साथ टकराव?

वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि आने वाले दिनों में वाशिंगटन और कोपेनहेगन (डेनमार्क की राजधानी) के बीच टकराव और बढ़ सकता है। ग्रीनलैंड के लोग अपनी स्वायत्तता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप अपने रुख पर अड़े रहे, तो यह ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन में अब तक की सबसे बड़ी दरार साबित हो सकती है। फिलहाल, नूक की सड़कों पर गूंज रही नारेबाजी दुनिया को यह संदेश दे रही है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता बिकाऊ नहीं है।

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