मध्य प्रदेश

Guna Water Crisis : गुना के इस आदिवासी गांव की खौफनाक हकीकत; क्या यही है आजादी का अमृतकाल?

Guna Water Crisis  : स्वतंत्रता के 78 वर्षों के बाद भी देश के ग्रामीण अंचलों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। मध्य प्रदेश के गुना जिले से सामने आई एक हृदयविदारक तस्वीर ने सरकारी विकास के बड़े-बड़े दावों की कलई खोलकर रख दी है। जिले के एक सुदूर आदिवासी गांव में आज भी लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए जमीन खोदकर गंदा पानी निकालने को विवश हैं। यहाँ की स्थिति इतनी अमानवीय हो चुकी है कि जिस छोटे से जलस्रोत से ग्रामीण पानी भरते हैं, वहीं बेजुबान जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं। बूंद-बूंद पानी के लिए जारी यह संघर्ष प्रशासनिक संवेदनहीनता को बयां करता है।

घने जंगलों के बीच विकास से महरूम टांडा गांव

गुना जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राई ग्राम पंचायत का टांडा गांव आज के आधुनिक दौर में भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। घने जंगलों के बीच बसे इस छोटे से आदिवासी बाहुल्य गांव में करीब 20 से 25 परिवार निवास करते हैं। इस गांव की विडंबना यह है कि यहाँ तक पहुँचने के लिए न तो पक्की सड़कें बनी हैं और न ही स्वच्छ पेयजल की कोई मुकम्मल व्यवस्था की गई है। दशकों बीत जाने के बाद भी इस गांव के निवासियों की तकदीर और बुनियादी परिस्थितियां जस की तस बनी हुई हैं।

‘झिरिया’ का दूषित पानी पीने की मजबूरी

टांडा गांव के ग्रामीणों के लिए पानी जुटाना रोजमर्रा की सबसे बड़ी चुनौती है। पूरे गांव में एक भी हैंडपंप, सरकारी बोरवेल या नल-जल योजना का नामोनिशान नहीं है। पानी की भारी किल्लत के कारण ग्रामीणों ने एक मौसमी नाले के किनारे गड्ढा खोदकर ‘झिरिया’ (छोटा कुआं) तैयार की है। इस गड्ढे में जो मटमैला पानी रिसकर इकट्ठा होता है, लोग उसे कपड़े से छानकर पीने, खाना पकाने और अन्य दैनिक कार्यों में इस्तेमाल करते हैं। इसी गंदे पानी को मवेशी भी पीते हैं, जिससे इंसानों और जानवरों के बीच का अंतर खत्म हो गया है।

गंदे पानी से बीमारियां और नेताओं की बेरुखी

दूषित जल के निरंतर सेवन के कारण गांव में बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। ग्रामीणों के अनुसार, गंदा पानी पीने से बच्चे और बुजुर्ग अक्सर डायरिया और पेट जनित रोगों का शिकार होते रहते हैं। स्थानीय लोगों ने कई बार पंचायत स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक गुहार लगाई, लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ। ग्रामीणों में जनप्रतिनिधियों को लेकर गहरा आक्रोश है; उनका कहना है कि नेता सिर्फ चुनाव के वक्त वोट मांगने आते हैं और झूठे आश्वासन देकर चले जाते हैं। यहाँ तक कि जीतने के बाद सरपंच ने भी गांव का रुख नहीं किया।

‘हर घर जल’ योजना की जमीनी हकीकत पर सवाल

टांडा गांव की यह दयनीय स्थिति केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी “हर घर जल” योजना की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है। एक तरफ जहां विज्ञापनों में हर ग्रामीण तक साफ पानी पहुंचाने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ जल स्रोतों के अभाव में लोग गड्ढे का पानी पीने को मजबूर हैं। यह केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के कई अन्य आदिवासी अंचलों में व्याप्त प्रशासनिक विफलता और ढांचागत अव्यवस्था का एक जीवंत और दुखद उदाहरण है।

जल्द समाधान का प्रशासनिक आश्वासन

इस गंभीर मुद्दे पर गुना के कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल का कहना है कि प्रशासन जिले के जल संकट ग्रस्त क्षेत्रों की लगातार निगरानी कर रहा है। पीएचई (PHE) और जल निगम के माध्यम से विभिन्न पेयजल परियोजनाओं पर काम तेजी से चल रहा है। कलेक्टर ने तर्क दिया कि ग्रीष्मकाल में भूजल स्तर (वॉटर लेवल) अत्यधिक नीचे चले जाने के कारण कुछ क्षेत्रों में अस्थाई समस्या उत्पन्न हो जाती है। उन्होंने दावा किया कि शासन द्वारा नए बोरवेल खनन की स्वीकृति दे दी गई है और जल्द ही इस गांव में पानी का संकट दूर कर दिया जाएगा।

विपक्ष ने घेरा और नल-जल योजना को बताया फेल

दूसरी तरफ, राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे को लेकर हलचल तेज हो गई है। बमोरी क्षेत्र से कांग्रेस विधायक ऋषि अग्रवाल ने इस दुर्दशा के लिए सीधे तौर पर वर्तमान सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या विकराल रूप ले चुकी है और बजट की भारी कमी के कारण नए बोरवेल नहीं खोदे जा पा रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि सरकार की नल-जल योजना पूरी तरह कागजी और फेल साबित हो चुकी है, जिसके कारण आदिवासियों को यह भुगतना पड़ रहा है।

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