Hanuman Ravana Yagna
Hanuman Ravana Yagna: रामायण का युद्ध केवल शारीरिक बल का नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियों और रणनीतियों का भी युद्ध था। एक समय ऐसा आया जब लंकापति रावण को अपनी पराजय का आभास होने लगा। इंद्रजीत और कुंभकर्ण जैसे योद्धाओं के पतन के बाद रावण पूरी तरह टूट चुका था। अपनी अंतिम रक्षा के लिए उसने एक ऐसे तांत्रिक और गुप्त यज्ञ का मार्ग चुना, जो उसे युद्ध में ‘अपराजेय’ बना सकता था। यदि यह यज्ञ सफल हो जाता, तो भगवान श्री राम के लिए भी रावण का वध करना असंभव हो जाता।
रावण वेदों का ज्ञाता और प्रकांड विद्वान था। उसने अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए एक विशेष ‘विजय यज्ञ’ प्रारंभ किया। यह अनुष्ठान लंका के एक अत्यंत सुरक्षित और गुप्त तहखाने में किया जा रहा था। इस यज्ञ की सबसे कठिन शर्त यह थी कि रावण को पूर्णतः मौन रहकर अपनी जगह से बिना हिले-डुले आहुति देनी थी। शास्त्रों के अनुसार, यदि इस यज्ञ की पूर्णाहुति हो जाती, तो रावण को एक ऐसा दिव्य कवच और रथ प्राप्त होता, जिसे ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति नहीं भेद पाती।
रावण ने इस यज्ञ को अत्यंत गोपनीय रखा था, लेकिन उसके छोटे भाई विभीषण को इस तांत्रिक अनुष्ठान का आभास हो गया। विभीषण ने तुरंत श्री राम के पास जाकर उन्हें सचेत किया। उन्होंने कहा, “हे प्रभु! रावण अपनी अंतिम शक्ति संचित कर रहा है। यदि उसका यह यज्ञ सफल हो गया, तो धर्म की रक्षा का यह युद्ध संकट में पड़ जाएगा। हमें किसी भी प्रकार से रावण का ध्यान भंग कर इस यज्ञ को रोकना होगा।”
भगवान श्री राम जानते थे कि एक तपस्वी को उसकी साधना से हटाना अधर्म है, लेकिन रावण का यह यज्ञ मानवता के विनाश के लिए था। उन्होंने हनुमान जी, अंगद और अन्य प्रमुख वानरों को लंका भेजा। श्री राम का निर्देश स्पष्ट था: रावण पर शस्त्र प्रहार नहीं करना है, बल्कि उसे मानसिक रूप से विचलित करना है। रावण का धैर्य ही उसकी शक्ति थी, और उसी धैर्य को तोड़ना वानर सेना का मुख्य लक्ष्य था।
हनुमान जी के नेतृत्व में वानर सेना रावण के गुप्त तहखाने में प्रवेश कर गई। वहां रावण ध्यानमग्न होकर मंत्रोच्चार कर रहा था। वानरों ने वहां हाहाकार मचा दिया। उन्होंने हवन कुंड की अग्नि को बुझाने का प्रयास किया, पूजन सामग्री को फेंक दिया और रावण को शारीरिक रूप से तंग करना शुरू किया। वानरों ने रावण के बाल खींचे और उसे अपशब्द कहे, परंतु रावण अडिग रहा। उसे ज्ञात था कि आसन छोड़ते ही उसकी सारी तपस्या निष्फल हो जाएगी।
जब किसी भी उपाय से रावण अपनी जगह से नहीं हिला, तब अंगद ने एक मनोवैज्ञानिक युक्ति अपनाई। उन्होंने रावण की पत्नी मंदोदरी को वहां लाकर उन्हें अपमानित करने का अभिनय किया। मंदोदरी ने रोते हुए रावण को ललकारा और कहा, “हे लंकापति! धिक्कार है आपके इस पुरुषार्थ पर। आप अपनी पत्नी की रक्षा करने के बजाय अपने प्राण बचाने के लिए ढोंग कर रहे हैं।” अपनी प्रिय पत्नी के इस विलाप और अपमान ने रावण के भीतर के अहंकार और क्रोध की ज्वाला भड़का दी।
जैसे ही रावण ने अपनी पत्नी की रक्षा और अंगद को दंड देने के लिए अपनी तलवार उठाई और आसन से खड़ा हुआ, उसका ‘विजय यज्ञ’ खंडित हो गया। यज्ञ भंग होते ही आकाश से उसकी अजेय होने की शक्तियाँ विलुप्त हो गईं। रावण समझ गया कि यह श्री राम की लीला थी और अब उसका काल निकट है। इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि अधर्म के मार्ग पर किया गया कोई भी अनुष्ठान कभी सफल नहीं हो सकता।
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