Himsagar Mango Farming
Himsagar Mango Farming: गर्मियों का मौसम अपने चरम पर है और इस तपते मौसम में फल मंडियों से लेकर स्थानीय बाजारों तक हर तरफ रसीले आमों की बहार देखने को मिल रही है। भारतीय बाजारों में आमतौर पर दशहरी, लंगड़ा, चौसा, सफेदा और अल्फांसो जैसी लोकप्रिय किस्मों का बोलबाला रहता है, लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल का पारंपरिक ‘हिमसागर’ आम भी ग्राहकों और किसानों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
अपने जबरदस्त रेशा रहित (Fibreless) मीठे गूदे और बेहद मनमोहक तेज खुशबू की अनूठी विशेषता के कारण इस फल को ‘आमों का कोहिनूर’ भी कहा जाता है। यही मुख्य कारण है कि हिमसागर की यह बेहतरीन किस्म अब सिर्फ पश्चिम बंगाल के भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत दूसरे पड़ोसी राज्यों के प्रगतिशील किसान भी इसकी व्यावसायिक बागवानी की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं कि आप अपने फार्म हाउस या खेत पर हिमसागर मैंगो की बागवानी कैसे शुरू कर सकते हैं और बाजार में यह आम कितने रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकता है।
हिमसागर आम की सबसे बड़ी और बेजोड़ खासियत इसका पूरी तरह से रेशा रहित होना है, जो इसे खाने का अनुभव दोगुना कर देता है। इसका अंदरूनी गूदा बेहद मुलायम, मखमली और अत्यधिक रसदार होता है, जो मुंह में जाते ही मलाई की तरह आसानी से घुल जाता है। इस आम की प्राकृतिक खुशबू इतनी लाजवाब और तेज होती है कि पकने के बाद दूर से ही इसकी मौजूदगी का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इन्हीं खूबियों की वजह से फल बाजार में इसकी मांग और लोकप्रियता हर साल लगातार ग्राफ बढ़ा रही है।
आकार और वजन की बात करें तो यह काफी सुडौल होता है और महज एक किलोग्राम में इस किस्म के सिर्फ तीन से चार आम ही चढ़ते हैं। हर साल मई महीने के आखिरी हफ्ते से लेकर पूरे जून तक इसका मुख्य सीजन रहता है और इसी समय देश की बड़ी फल मंडियों में इसकी सबसे ज्यादा खेप पहुंचती है और बिक्री होती है। कई बड़े फल विक्रेताओं का कहना है कि शौकीन ग्राहक खासतौर पर नाम लेकर हिमसागर आम की मांग करते हैं, जिसके चलते दूसरे आमों के मुकाबले दुकानदारों को इसकी बहुत अच्छी कीमत मिल जाती है।
यदि आप हिमसागर आम की व्यावसायिक खेती करने का मन बना रहे हैं, तो इसके लिए मुख्य रूप से गर्म और मध्यम आर्द्र (Humid) जलवायु को सबसे उपयुक्त और अनुकूल माना जाता है। बेहतर जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट मिट्टी में इसके पौधे बहुत तेजी से और स्वस्थ तरीके से विकास करते हैं। बागवानी के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि चुने गए खेत में कहीं भी पानी जमा नहीं होना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक जलभराव से पौधों की संवेदनशील जड़ें सड़ने और खराब होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
अनुभवी बागवानों के अनुसार, मानसून की शुरुआत यानी जुलाई-अगस्त के महीनों में इसका पौधारोपण करना सबसे उत्तम माना जाता है। हालांकि, जिन इलाकों में सिंचाई के पक्के और आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, वहां किसान फरवरी और मार्च के महीनों में भी इसकी रोपाई आसानी से कर सकते हैं। इसके साथ ही, हिमसागर के पेड़ों को भविष्य में फैलने के लिए पर्याप्त खाली जगह देना बेहद जरूरी होता है; इसलिए रोपाई के वक्त दो पौधों के बीच कम से कम 10 से 10 मीटर की मानक दूरी अवश्य रखनी चाहिए। खेत तैयार करते समय मिट्टी की दो से तीन बार गहरी जुताई कर उसमें पर्याप्त मात्रा में सड़ी हुई जैविक गोबर की खाद मिला देनी चाहिए।
शुरुआती विकास के वर्षों में हिमसागर के छोटे पौधों को नियमित लेकिन बहुत ही हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है। कड़कती गर्मियों के मौसम में पौधों की नमी बनाए रखने के लिए 5 से 7 दिनों के अंतराल पर हल्का पानी देना सबसे बेहतर माना जाता है, जबकि सर्दियों के महीनों में सिंचाई के इस समय अंतराल को थोड़ा बढ़ाया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आम के बाग में एक बार में ज्यादा पानी भरने की बजाय जरूरत के हिसाब से हल्की सिंचाई करना पौधों के स्वास्थ्य के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।
इस आम के पौधों से भरपूर पैदावार लेने के लिए किसानों को समय-समय पर जैविक खाद, नीम की खली और मिट्टी की जांच के अनुसार जरूरी रासायनिक उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करना चाहिए। बाग में पेड़ों पर बौर (फूल) आने से ठीक पहले रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्रों में यूरिया के हल्के छिड़काव की भी सलाह दी जाती है। यदि हम फल आने की समय सीमा की बात करें, तो ग्राफ्टेड यानी कलमी तकनीक से तैयार किए गए पौधे रोपाई के महज 3 से 5 साल के भीतर ही व्यावसायिक रूप से फल देना शुरू कर देते हैं। शुरुआती सालों में एक युवा पेड़ से लगभग 10 से 20 फल ही प्राप्त होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे पेड़ पुराना और बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे सालाना उत्पादन में भारी इजाफा होता जाता है।
चूंकि हिमसागर आम का स्वाद बेहद विशिष्ट होता है और इसका सीजन भी बहुत सीमित समय के लिए आता है, इसलिए बाजार में इसकी मांग हमेशा आपूर्ति से कहीं अधिक बनी रहती है। अपनी इसी प्रीमियम गुणवत्ता, शानदार स्वाद और रेशा रहित टेक्सचर की वजह से यह आम आम तौर पर बिकने वाले अन्य सामान्य आमों (जैसे चौसा या सिन्दूरी) की तुलना में काफी ऊंचे और महंगे दामों पर बिकता है।
खुदरा बाजारों और महानगरों के प्रीमियम स्टोर्स में इसकी कीमत आसानी से 150 रुपये से लेकर 300 रुपये प्रति किलोग्राम तक के स्तर पर पहुंच जाती है। वहीं, जो किसान पूरी तरह से सर्टिफाइड ऑर्गेनिक (जैविक) तरीके से बिना किसी केमिकल के हिमसागर आम की पैदावार करते हैं, उन्हें विदेशी बाजारों और बड़े शहरों में इससे भी कहीं अधिक और आकर्षक दाम मिल जाते हैं। ऐसे में इसकी बागवानी किसानों के लिए एक दीर्घकालिक और बेहद मुनाफेदार सौदा साबित हो रही है।
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