Holashtak 2026
Holashtak 2026: हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में समय की गणना का विशेष महत्व है। होली से ठीक आठ दिन पहले ‘होलाष्टक’ लग जाता है, जिसे बेहद अशुभ समय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन आठ दिनों में ग्रहों का स्वभाव काफी उग्र रहता है, जिसके कारण शुभ कार्यों का फल सकारात्मक नहीं मिलता। होलाष्टक के दौरान शादी-विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश और नामकरण संस्कार जैसे महत्वपूर्ण कार्य पूरी तरह वर्जित होते हैं। साल 2026 में भी होली से पहले यह समय भक्ति और साधना के लिए तो श्रेष्ठ है, लेकिन सांसारिक मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित रहेगा।
होलाष्टक के अलावा ‘पंचक’ भी वह समय है जब शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। चंद्रमा जब कुंभ और मीन राशि में गोचर करते हैं, तब पांच दिनों की इस अवधि को पंचक कहा जाता है। ज्योतिष में पंचक पांच प्रकार के होते हैं: मृत्यु पंचक, अग्नि पंचक, रोग पंचक, चोर पंचक और नृप पंचक। इस दौरान विशेष रूप से लकड़ी से जुड़े काम, घर की छत डलवाना या ईंधन इकट्ठा करना वर्जित माना गया है। पंचक हर महीने लगता है, इसलिए कोई भी नया निर्माण या शुभ कार्य शुरू करने से पहले पंचांग देखना अनिवार्य है।
हिंदू कैलेंडर में ‘खरमास’ का समय भी मांगलिक कार्यों के लिए अशुभ माना गया है। जब सूर्य देव बृहस्पति की राशियों (धनु या मीन) में प्रवेश करते हैं, तो उनकी गति धीमी हो जाती है और उनकी शुभता में कमी आती है। साल में दो बार आने वाले इस एक-एक महीने के अंतराल में विवाह और सगाई जैसे संस्कार थम जाते हैं। माना जाता है कि खरमास में किए गए कार्यों से सुख-समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए देवोत्थान या सूर्य के राशि परिवर्तन का इंतजार किया जाता है।
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों को ‘पितृपक्ष’ या श्राद्ध पक्ष कहा जाता है। यह समय पूरी तरह से पितरों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए समर्पित होता है। इस अवधि में नए कपड़े खरीदना, गहने लेना या कोई भी उत्सव मनाना वर्जित है। धार्मिक दृष्टि से यह समय शोक या अशुभता का नहीं, बल्कि पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का है, इसलिए इस दौरान भौतिक सुख-सुविधाओं से जुड़े मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को सनातन धर्म में खगोलीय घटना के साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टि से भी संवेदनशील माना गया है। ग्रहण से पहले ‘सूतक काल’ शुरू हो जाता है (सूर्य ग्रहण में 12 घंटे और चंद्र ग्रहण में 9 घंटे पहले)। सूतक लगने के बाद से ग्रहण समाप्त होने तक मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं और मूर्तियों को छूना भी मना होता है। इस काल में किसी भी नए कार्य की शुरुआत करना वर्जित है, क्योंकि राहु-केतु के प्रभाव से नकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी तक के चार महीनों को ‘चातुर्मास’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। सृष्टि के पालनहार के शयन काल में होने के कारण, इन चार महीनों में कोई भी विवाह या बड़े मांगलिक आयोजन नहीं किए जाते। चातुर्मास का समय संयम, व्रत और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
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