Ambikapur News : मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व हुई एक आदिवासी महिला की मौत के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने छत्तीसगढ़ सरकार को मृतका के निकटतम परिजन को पांच लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि शासन चाहे तो यह राशि दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों से वसूल सकता है। आयोग ने प्रशासनिक स्तर पर की गई कार्रवाई को अपर्याप्त बताते हुए असंतोष भी जाहिर किया है। सरगुजा जिले में यह पहला मामला है, जिसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सीधे पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह मामला 28 जुलाई 2024 का है, जब दर्रीपारा अंबिकापुर निवासी आदिवासी महिला शांति मरावी की मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में मौत हो गई थी। मृतका के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकीय स्टाफ पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि महिला की तबीयत बिगड़ने पर वे दो दिन तक लगातार अस्पताल पहुंचे, लेकिन हर बार उसे भर्ती करने से मना कर दिया गया।
परिजनों के अनुसार, पहली और दूसरी बार अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने शराब सेवन और गर्मी के कारण तबीयत बिगड़ने का हवाला देते हुए महिला को भर्ती नहीं किया। तीसरी बार जब हालत अत्यधिक गंभीर हो गई और वे महिला को लेकर अस्पताल पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अंबिकापुर के भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सरगुजा से विस्तृत प्रतिवेदन तलब किया था।
आयोग को सीएमएचओ सरगुजा की ओर से प्रस्तुत प्रतिवेदन में बताया गया कि ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक और नर्स के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। हालांकि, जांच में आयोग को यह प्रतीत हुआ कि नियमित चिकित्सकों और स्टाफ नर्सों के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। केवल प्रशिक्षु नर्सों और प्रशिक्षु चिकित्सकों की प्रशिक्षण अवधि बढ़ाकर औपचारिकता निभाई गई, जिसे आयोग ने खानापूर्ति माना।
आयोग द्वारा भेजे गए प्रतिवेदन पर शिकायतकर्ता पार्षद आलोक दुबे ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने कहा कि तीन माह और छह माह की प्रशिक्षण अवधि बढ़ाना किसी भी दृष्टि से दंडात्मक कार्रवाई नहीं है। न दोषी नियमित स्टाफ पर कार्रवाई हुई और न ही पीड़ित परिवार को कोई राहत दी गई।
शिकायतकर्ता के प्रत्युत्तर और तथ्यों पर विचार करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने माना कि मृतका अनुसूचित जनजाति की महिला थी और उसकी मृत्यु शासकीय अस्पताल में चिकित्सा लापरवाही के कारण हुई। इस आधार पर आयोग ने छत्तीसगढ़ शासन के मुख्य सचिव को निर्देशित किया है कि मृतका के निकटतम स्वजन को पांच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति राशि भुगतान प्रमाण की तिथि से दो सप्ताह के भीतर दी जाए।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि शासन को यह अधिकार होगा कि वह उक्त राशि दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों से वसूल करे। इस संबंध में पूर्ण प्रतिवेदन 24 जनवरी तक आयोग को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। यह आदेश आयोग के परामर्शदाता (कानून) एल.एम. पाठक द्वारा जारी किया गया है।
यह मामला सरगुजा जिले में एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जहां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने चिकित्सा लापरवाही को मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए सीधे पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह फैसला भविष्य में सरकारी अस्पतालों में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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