CEC Impeachment
Gyanesh Kumar Impeachment: भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक इतिहास में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आ रहा है। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों का गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव लाने की पूरी तैयारी कर चुका है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, विपक्ष अगले एक या दो दिनों के भीतर संसद में इस प्रस्ताव को पेश कर सकता है। यदि यह प्रस्ताव सदन के पटल पर आता है, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला अवसर होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इस कदम ने देश की सियासत में हलचल तेज कर दी है और चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर एक नई बहस छेड़ दी है।
इस महाभियोग प्रस्ताव को मजबूती देने के लिए विपक्ष ने दोनों सदनों के सांसदों का समर्थन जुटाया है। सूत्रों का दावा है कि लोकसभा के 120 और राज्यसभा के 60 सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। विपक्षी दल 12 या 13 मार्च 2026 को आधिकारिक तौर पर इस नोटिस को संसद में सबमिट कर सकते हैं। विपक्ष का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था की गरिमा को बचाए रखने के लिए यह कठोर कदम उठाना अनिवार्य हो गया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा के लिए है।
विपक्ष द्वारा तैयार किए गए महाभियोग प्रस्ताव के ड्राफ्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त पर कई गंभीर और संगीन आरोप लगाए गए हैं। प्रस्ताव के मुख्य आधार ‘साबित कदाचार’ (Proven Misconduct) और भेदभावपूर्ण व्यवहार को बनाया गया है।
मतदाताओं को रोकना: आरोप है कि हालिया चुनावों और ‘SIR एक्सरसाइज’ के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को वोट देने से रोकने की कोशिश की गई।
टीएमसी प्रतिनिधिमंडल से दुर्व्यवहार: तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया है कि जब उनका प्रतिनिधिमंडल आयोग से मिलने गया, तो उनके साथ अपमानजनक व्यवहार हुआ।
संवैधानिक संस्थानों का दुरुपयोग: विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र निकाय के बजाय सत्ता पक्ष के औजार के रूप में काम कर रहा है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल है जितनी कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की। सीईसी को केवल ‘साबित कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।
भारत में महाभियोग की चर्चा होते ही 1993 का वह दौर याद आता है जब जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। उस समय मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने संसद की दहलीज पर खड़े होकर रामास्वामी के पक्ष में करीब 6 घंटे तक दलीलें दी थीं। हालांकि वह प्रस्ताव गिर गया था, लेकिन सिब्बल के तर्कों से प्रभावित होकर कांग्रेस ने उन्हें राजनीति में प्रवेश दिया था। अब 33 साल बाद, एक बार फिर संसद महाभियोग की साक्षी बनने जा रही है, लेकिन इस बार निशाना न्यायपालिका नहीं बल्कि चुनाव आयोग है।
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