India-EU Trade Deal
India-EU Trade Deal: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच आर्थिक संबंधों का एक नया स्वर्णिम अध्याय शुरू होने जा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ इस महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अंतिम मुहर लगा सकते हैं। यूरोपीय संघ ने इस संभावित संधि को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार दिया है, जो न केवल व्यापारिक बाधाओं को दूर करेगी बल्कि दोनों शक्तियों के बीच एक ‘टोल-फ्री’ व्यापारिक गलियारा तैयार करेगी।
यह समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था के रणनीतिक संतुलन को बदलने की क्षमता रखता है। वर्तमान में दुनिया अमेरिका और चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है, ऐसे में भारत एक विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर रहा है। यह डील दुनिया की लगभग 25% जीडीपी को एक मंच पर लाएगी, जिससे करीब 200 करोड़ लोगों का एक विशाल एकीकृत बाज़ार बनेगा। पिछले साल का द्विपक्षीय व्यापार ₹12.5 लाख करोड़ रहा था, जिसके इस समझौते के बाद दोगुना होने का अनुमान है।
इस समझौते का सीधा लाभ भारत के लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को मिलेगा। कपड़ा (Textiles), जूते और लेदर प्रोडक्ट्स पर लगने वाली 10% तक की ड्यूटी खत्म होने से भारतीय माल यूरोप में सस्ता और प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। इसके अतिरिक्त:
रक्षा क्षेत्र: फ्रांस और जर्मनी जैसे देश भारत में अपनी डिफेंस फैक्ट्रियां लगा सकते हैं।
फार्मा और केमिकल्स: इस सेक्टर में सालाना 20-30% की वृद्धि की उम्मीद है।
कार्बन टैक्स: यूरोप के सख्त कार्बन टैक्स नियमों से भारतीय स्टील और एल्युमिनियम उद्योगों को बड़ी राहत मिल सकती है।
यूरोपीय संघ के लिए भारत एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार है। इस समझौते के तहत भारत में विदेशी शराब और लग्जरी कारों पर आयात शुल्क (Import Duty) में भारी कटौती की जाएगी। विशेष रूप से, जो विदेशी कारें अभी 110% टैक्स के दायरे में आती हैं, उन पर टैक्स घटकर पहले 40% और भविष्य में 10% तक आ सकता है। इससे BMW, मर्सिडीज और पॉर्श जैसी कंपनियों के लिए भारतीय सड़कों पर दौड़ना आसान हो जाएगा।
इस व्यापारिक रिश्ते की नींव 2007 में रखी गई थी, लेकिन कृषि, डेयरी सेक्टर और टैक्स ढांचे पर असहमति के कारण 2013 में बातचीत ठप हो गई थी। मुख्य विवाद टैरिफ कटौती की सीमा पर था—जहाँ यूरोपीय संघ 95% उत्पादों पर जीरो टैक्स चाहता था, वहीं भारत अपनी घरेलू सुरक्षा के लिए इसे 90% तक सीमित रखना चाहता था। अब लंबे अंतराल और कई दौर की वार्ताओं के बाद, दोनों पक्ष एक बीच का रास्ता निकालने में सफल होते दिख रहे हैं।
जहाँ यह डील असीम अवसर ला रही है, वहीं कुछ चुनौतियाँ भी सामने हैं। यूरोपीय संघ के सख्त पर्यावरण और लेबर मानकों के कारण भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा, सख्त पेटेंट नियमों के कारण कुछ दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है। घरेलू सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को विशाल यूरोपीय ब्रांड्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। हालांकि, जीआई (GI) टैग वाले उत्पादों को मिलने वाली सुरक्षा भारतीय हस्तशिल्प और विशिष्ट उत्पादों के लिए नए द्वार खोलेगी।
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