India at UNSC: भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक, समावेशी और समयबद्ध सुधारों की मांग एक बार फिर दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतानेनी हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया अब और टालनी नहीं चाहिए। इसके लिए स्पष्ट समय-सीमा और ठोस मील के पत्थर तय करते हुए ‘टेक्स्ट-आधारित वार्ता’ शुरू करना आवश्यक है। भारत का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप परिषद की संरचना और निर्णय प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए।

केवल वीटो पर चर्चा से नहीं होगा समाधान
राजदूत हरीश ने कहा कि सुधार की बहस को केवल वीटो अधिकार तक सीमित रखने से स्थायी सदस्यों के निर्णय लेने के तरीके में बुनियादी बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने औपचारिक वीटो के अलावा ‘डी-फैक्टो वीटो’ यानी व्यवहार में किसी प्रस्ताव को रोक देने की व्यवस्था पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, कई बार सुरक्षा परिषद में सर्वसम्मति की अनौपचारिक परंपरा के कारण एक सदस्य भी निर्णय को आगे बढ़ने से रोक सकता है, भले ही उसने औपचारिक रूप से वीटो का इस्तेमाल न किया हो।

डी-फैक्टो वीटो और जवाबदेही का मुद्दा
भारतीय राजदूत के मुताबिक, राष्ट्रपति के बयानों, प्रेस वक्तव्यों और प्रतिबंध समितियों के निर्णयों में सर्वसम्मति की अनलिखी व्यवस्था का इस्तेमाल प्रस्तावों को रोकने के लिए किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित सदस्य की आपत्ति के पीछे का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता। भारत का तर्क है कि इस तरह की प्रक्रिया परिषद की पारदर्शिता और जवाबदेही को प्रभावित करती है। इसलिए सुधार के दौरान औपचारिक वीटो के साथ-साथ उन तरीकों पर भी विचार किया जाना चाहिए, जिनसे निर्णय प्रक्रिया अनौपचारिक रूप से बाधित होती है।
नए स्थायी सदस्यों को समान अधिकार देने की मांग
हरीश ने कहा कि भारत का रुख ‘कॉमन अफ्रीकन पोजिशन’ के सिद्धांतों के अनुरूप है। उन्होंने जोर दिया कि यदि वीटो का अधिकार समाप्त नहीं किया जाता, तो सुधार के बाद परिषद में शामिल होने वाले सभी स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिलने चाहिए। भारत के अनुसार, स्थायी सदस्यों के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों में अंतर बनाए रखना समानता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
अलग श्रेणी के स्थायी सदस्य बनाने पर आपत्ति
भारत ने ऐसी व्यवस्था पर भी चिंता जताई, जिसमें नए स्थायी सदस्यों को वीटो के बिना या अलग शर्तों के साथ शामिल किया जाए। हरीश के अनुसार, इससे परिषद में पहले से मौजूद असमानता और गहरी हो सकती है। भारत का मानना है कि सुधार का उद्देश्य अधिक प्रतिनिधित्व और निष्पक्षता सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि स्थायी सदस्यों के बीच अधिकारों की नई असमान श्रेणियां बनाना। इसी कारण भारत समान अधिकारों वाली व्यवस्था पर जोर देता रहा है।

वीटो का इस्तेमाल संयम और जिम्मेदारी से हो
वीटो के इतिहास का उल्लेख करते हुए भारतीय राजदूत ने कहा कि यह पांच स्थायी सदस्यों का विशेषाधिकार जरूर है, लेकिन इसके साथ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। उनके अनुसार, वीटो का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा को ध्यान में रखकर अत्यंत संयम से किया जाना चाहिए।
331 बार वीटो इस्तेमाल होने का उल्लेख
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में प्रस्तावों पर लगभग 331 बार वीटो का इस्तेमाल किया गया है। हरीश ने स्थायी सदस्यों के रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए कहा कि वीटो का इस्तेमाल और इसकी धमकियां कुछ देशों तक केंद्रित रही हैं। भारत की मांग है कि परिषद की निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बने, प्रस्तावों को रोकने के पीछे स्पष्ट जवाबदेही हो और सुधारों के लिए ठोस समय-सीमा तय की जाए।
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