Rupee Falls
Rupee Falls : भारतीय मुद्रा बाजार में मंगलवार का दिन निवेशकों के लिए भारी उथल-पुथल भरा रहा। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 41 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 94.56 (अस्थायी) के स्तर पर बंद हुआ। बाजार खुलने के साथ ही रुपए में कमजोरी के संकेत मिलने लगे थे, जब यह 94.35 पर खुला और दिन के दौरान 94.58 के निचले स्तर तक चला गया। सोमवार को रुपया मामूली बढ़त के साथ 94.15 पर बंद हुआ था, लेकिन वैश्विक दबावों के चलते यह बढ़त टिक नहीं सकी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने की आशंका और विदेशी पूंजी की निकासी ने रुपए की कमर तोड़ दी है।
रुपए में गिरावट का एक मुख्य कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 19 अरब डॉलर से अधिक की रकम निकाल ली है। विदेशी फंड के इस निरंतर बहिर्वाह ने रुपए पर भारी दबाव पैदा किया है। जानकारों का कहना है कि जब तक विदेशी पूंजी का प्रवाह स्थिर नहीं होता, तब तक मुद्रा बाजार में स्थिरता आना मुश्किल है। केवल सोमवार को ही विदेशी निवेशकों ने 1,151.48 करोड़ रुपए के शेयर बेचे, जो बाजार की नाजुक स्थिति को दर्शाता है।
घरेलू कारणों के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों ने भी रुपए को कमजोर किया है। डॉलर इंडेक्स, जो दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापता है, 0.24 प्रतिशत बढ़कर 98.73 पर पहुंच गया। दूसरी ओर, कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा दी हैं। वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 2.62 प्रतिशत की तेजी के साथ 111.07 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। चूंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर रुपए के मूल्य को प्रभावित करती हैं।
CareEdge Ratings की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने बताया कि रुपए पर मुख्य दबाव पूंजी के कमजोर प्रवाह से आ रहा है। नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) फ्लो कम रहा है, जबकि पोर्टफोलियो निवेश (FPI) वैश्विक अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी के उच्च मूल्यांकन के कारण प्रभावित हुआ है। सिन्हा के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। यदि निकट भविष्य में यह संघर्ष कम भी होता है, तो भी वित्त वर्ष 2027 में कच्चे तेल की औसत कीमत 85-90 डॉलर प्रति बैरल रहने की उम्मीद है, जिससे रुपया औसतन 92-93 की सीमा में रह सकता है।
मुद्रा बाजार की गिरावट का सीधा असर घरेलू शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 416.72 अंक गिरकर 76,886.91 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 97 अंक की गिरावट के साथ 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे 23,995.70 पर आ गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ब्याज दरों में अंतर और अन्य आर्थिक संकेतकों के आधार पर रुपया वर्तमान में कुछ ‘अंडरवैल्यूड’ नजर आ रहा है। हालांकि, यदि भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है या कच्चे तेल की कीमतें नई ऊंचाइयों को छूती हैं, तो आने वाले दिनों में रुपए पर और भी अधिक दबाव देखने को मिल सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रुपए की स्थिति में सुधार काफी हद तक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और विदेशी निवेश की वापसी पर निर्भर करेगा। वर्तमान में पूंजी का अस्थिर प्रवाह एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार और केंद्रीय बैंक की नीतियों पर सबकी नजरें टिकी हैं कि वे गिरते रुपए को संभालने और विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो रुपए को कुछ राहत मिल सकती है, अन्यथा निवेशकों को आने वाले समय में और अधिक उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा।
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