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Dollar vs Rupee : डॉलर के मुकाबले ₹96 के पार पहुंचा भारतीय रुपया, आम जनता पर बढ़ेगी महंगाई की मार

Dollar vs Rupee : भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के लिए आज का दिन बेहद निराशाजनक और एक भयानक बुरे सपने की तरह साबित हुआ है। विदेशी मुद्रा बाजार (फॉरेक्स मार्केट) में भारी उथल-पुथल के बीच भारतीय रुपया (INR) इतिहास के अपने सबसे निचले और सर्वकालिक अवसादपूर्ण स्तर पर गोता लगा चुका है। देश के आर्थिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर होते-होते के ऐतिहासिक मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर गया है।

आज सुबह जैसे ही घरेलू बाजार खुला, रुपये में गिरावट का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया, जिसने वित्तीय विश्लेषकों, बड़े निवेशकों और देश की आम जनता के बीच हड़कंप मचा दिया। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में लगातार जारी भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध के हालात और इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की आसमान छूती कीमतों ने रुपये की कमर पूरी तरह से तोड़ दी है। हालांकि, देश के एक सामान्य नागरिक के लिए यह गिरावट केवल टीवी स्क्रीन पर चमकने वाला कोई सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था, मासिक बजट और जेब पर होने वाला एक बहुत ही तीखा और सीधा प्रहार है।

घरेलू रसोई का बजट होगा बेपटरी: आयातित खाद्य तेल और दालें होंगी और महंगी

भारत आज भी अपनी विशाल आबादी की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसमें मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के खाद्य तेल (जैसे पाम ऑयल और सोयाबीन तेल) और कई महत्वपूर्ण दालें शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का पूरा ढांचा अमेरिकी डॉलर पर टिका हुआ है, इसलिए जब भी रुपया कमजोर होता है, तो भारतीय आयातकों को समान मात्रा में सामान खरीदने के लिए विदेशों में बहुत ज्यादा डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। इसका सीधा और तात्कालिक नतीजा यह होने वाला है कि आने वाले दिनों में आपके किचन में रोजाना इस्तेमाल होने वाला रिफाइंड तेल, सरसों का तेल और हर थाली की जरूरत मानी जाने वाली दालों की खुदरा कीमतें काफी हद तक बढ़ सकती हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह से डगमगा जाएगा।

ईंधन की कीमतों में संभावित उछाल: पेट्रोल, डीजल और परिवहन की दोहरी मार

रुपये के मूल्य में आई इस ऐतिहासिक गिरावट का सबसे विनाशकारी और व्यापक असर देश के ईंधन क्षेत्र पर पड़ने की पूरी आशंका है। एक विकासशील देश होने के नाते भारत अपनी कुल कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की जरूरत का लगभग 80% हिस्सा दूसरे देशों से जहाजों के जरिए आयात करता है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का के पार चले जाने का सीधा और साफ मतलब यह है कि देश के तेल आयात बिल में भारी बढ़ोतरी होगी और सरकारी व निजी तेल कंपनियों के लिए कच्चे तेल को भारत लाना बहुत महंगा सौदा हो जाएगा।

इस स्थिति के कारण न केवल पेट्रोल और डीजल के दामों में एक बार फिर से आग लगेगी, बल्कि माल ढुलाई करने वाले ट्रकों, कमर्शियल वाहनों और टेम्पो का किराया भी आनुपातिक रूप से बढ़ जाएगा। जब परिवहन लागत बढ़ती है, तो इसका एक चेन-रिएक्शन होता है, जिससे मंडियों तक आने वाली रोजमर्रा की हरी सब्जियां, दूध और फल भी आम उपभोक्ताओं के लिए अत्यधिक महंगे हो जाते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष कठिन परीक्षा: रेपो रेट और लोन की ईएमआई बढ़ने का खतरा

इस अप्रत्याशित वित्तीय संकट और रुपये की लगातार हो रही इस दुर्गति को संभालने के लिए देश के केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने अब एक बहुत बड़ी प्रशासनिक और आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है। बाजार में रुपये की तरलता और उसकी साख को स्थिर बनाए रखने के लिए आरबीआई को अपने बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) से बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

इसके अतिरिक्त, रुपये के कमजोर होने से देश में जो आयातित मुद्रास्फीति (इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन) आएगी, उस महंगाई को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक अपनी आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा में मुख्य ब्याज दरों यानी रेपो रेट (Repo Rate) में बढ़ोतरी का कड़ा कदम उठा सकता है। अगर केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की जाती है, तो देश के बैंकों के लिए कर्ज देना महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ेगा क्योंकि आपके होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की मासिक किस्तें यानी ईएमआई (EMI) तुरंत बढ़ जाएंगी, जिससे लोगों की बचत करने की क्षमता और कम हो जाएगी।

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