USD vs Rupee
USD vs Rupee: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं का सीधा असर अब भारतीय मुद्रा पर दिखने लगा है। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 13 पैसे टूटकर 92.43 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर जा गिरा। शुक्रवार को रुपया 92.30 पर बंद हुआ था, लेकिन सोमवार को बाजार खुलते ही इसमें भारी दबाव देखा गया। जानकारों का मानना है कि यदि खाड़ी देशों में तनाव लंबे समय तक खिंचता है, तो आने वाले दिनों में भारतीय मुद्रा की स्थिति और भी नाजुक हो सकती है। फॉरेक्स ट्रेडर्स के अनुसार, विदेशी पूंजी की निरंतर निकासी ने रुपये की कमर तोड़ दी है।
रुपये के गिरने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण उभरकर सामने आए हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) 1.03 प्रतिशत की बढ़त के साथ 104.22 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, जिसके भुगतान के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होती है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। दूसरा कारण है विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर की जा रही बिकवाली। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कारोबारी सत्र में विदेशी निवेशकों ने करीब 10,716.64 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिससे बाजार से डॉलर बाहर निकल गया और रुपया कमजोर हुआ।
एक तरफ जहां रुपया अपने सबसे निचले स्तर को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय शेयर बाजार में अप्रत्याशित तेजी का माहौल रहा। शुरुआती कारोबार में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स करीब 139 अंक यानी 0.19 प्रतिशत उछलकर 74,703.20 के स्तर पर पहुंच गया। इसी तरह, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 51 अंकों की बढ़त के साथ 23,202.20 पर कारोबार करता नजर आया। हालांकि, बाजार की यह बढ़त अस्थिर बनी हुई है क्योंकि मुद्रा बाजार और शेयर बाजार के संकेत एक-दूसरे के विपरीत दिशा में जा रहे हैं। डॉलर इंडेक्स भी फिलहाल 99.98 के स्तर पर बना हुआ है, जो प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दर्शाता है।
रुपये की गिरती कीमत को संभालने की कोशिशों के बीच देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) से जुड़ी एक चिंताजनक खबर आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 6 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 11.683 अरब डॉलर घटकर 716.810 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले यह भंडार 728.494 अरब डॉलर के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। मुद्रा भंडार में आई यह बड़ी गिरावट दर्शाती है कि केंद्रीय बैंक को रुपये को बहुत ज्यादा गिरने से बचाने के लिए डॉलर के भंडार का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जो लंबी अवधि के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
आने वाले समय में रुपये की चाल काफी हद तक पश्चिम एशिया के हालात और कच्चे तेल की सप्लाई पर निर्भर करेगी। यदि ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूता है, तो रुपया 93 या 94 के स्तर तक भी फिसल सकता है। फिलहाल, इंटरबैंक फॉरेक्स मार्केट में भारी अस्थिरता है और निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर की ओर भाग रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस नहीं लौटता और वैश्विक तेल कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रहेगा। प्रशासन और आरबीआई की पैनी नजर अब विदेशी मुद्रा प्रवाह को नियंत्रित करने पर टिकी है।
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