Iran-US Tension
Iran-US Tension : ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चला आ रहा रणनीतिक और कूटनीतिक तनाव एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हालिया घटनाक्रम में, दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध को सुलझाने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब ईरान ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश को साफ तौर पर ठुकरा दिया। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह वर्तमान परिस्थितियों में पाकिस्तान को एक निष्पक्ष बिचौलिए के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इस बयान ने न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों की जटिलता को बढ़ाया है, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
ईरान की संसदीय राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति आयोग के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई ने इस मुद्दे पर ईरान का पक्ष मजबूती से रखा। रेजाई ने पाकिस्तान की तटस्थता पर उंगली उठाते हुए कहा कि किसी भी सफल मध्यस्थता के लिए बिचौलिए का पूरी तरह निष्पक्ष होना अनिवार्य शर्त है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान निस्संदेह हमारा एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और करीबी मित्र राष्ट्र है, लेकिन कूटनीतिक वार्ताओं की मेज पर वह एक उपयुक्त मध्यस्थ की भूमिका निभाने के योग्य नहीं है।” ईरान का मानना है कि पाकिस्तान का झुकाव अक्सर पश्चिमी ताकतों और विशेषकर अमेरिका की ओर रहता है, जिससे बातचीत का संतुलन बिगड़ने का डर रहता है।
इब्राहिम रेजाई ने अपने बयान में अमेरिका को भी आड़े हाथों लिया और पाकिस्तान की अक्षमता को दर्शाने के लिए पुराने अनुभवों का हवाला दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत में अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से आए एक प्रस्ताव को पहले स्वीकार किया, लेकिन बाद में बड़ी ही आसानी से अपनी बात से मुकर गया। रेजाई के अनुसार, पाकिस्तान में इतनी कूटनीतिक हिम्मत नहीं है कि वह वैश्विक मंच पर अमेरिका की इस वादाखिलाफी का पर्दाफाश कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि लेबनान संकट और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को लेकर अमेरिका ने कई समझौते किए थे, जिन्हें बाद में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
ईरान के इस सख्त रुख से यह संदेश साफ हो गया है कि वह अब केवल उन देशों के साथ बातचीत की मेज पर बैठेगा, जो अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होकर स्वतंत्र राय रख सकें। रेजाई ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान उन मामलों में भी अमेरिका पर दबाव बनाने में विफल रहा है जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून ईरान के पक्ष में थे। ईरान अब किसी भी ऐसे देश को ‘ब्रिज’ (सेतु) के रूप में स्वीकार करने के मूड में नहीं है, जिसका अपना रणनीतिक हित अमेरिका के साथ बंधा हुआ हो।
ईरान का यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक हार की तरह देखा जा रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को मुस्लिम जगत और पश्चिमी देशों के बीच एक प्रभावशाली मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है। हालांकि, ईरान द्वारा उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि पड़ोसी देश भी अब पाकिस्तान की कूटनीति पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जहाँ अब नए और अधिक विश्वसनीय मध्यस्थों की तलाश शुरू हो सकती है।
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