Iran-US Crisis
Iran-US Crisis: ईरान और अमेरिका के बीच चल रही शांति वार्ता का दूसरा दौर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में प्रस्तावित है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। दोनों देशों के बीच जारी जुबानी जंग और आक्रामक तेवर इस बात का संकेत दे रहे हैं कि वर्तमान संघर्षविराम (Ceasefire) अधिक समय तक टिकने वाला नहीं है। एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से सीधी बातचीत की इच्छा जताई है, वहीं दूसरी ओर ईरानी सेना ने अपनी तैयारी और ताकत का प्रदर्शन कर पश्चिमी देशों को चुनौती दी है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में नहीं झुकेगा।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की स्थापना की वर्षगांठ के ऐतिहासिक अवसर पर ईरान के ‘खत्म अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर’ के कमांडर मेजर जनरल अली अब्दोल्लाही ने एक कड़ा संदेश जारी किया। उन्होंने गौरव के साथ कहा कि आज ईरान की जनता अपनी सेना की रणनीतिक क्षमताओं और तैयारियों पर पूर्ण विश्वास रखती है। अब्दोल्लाही के अनुसार, ईरानी सेना की मिसाइल तकनीक और ड्रोन मारक क्षमता ने इजरायल और अमेरिका जैसे देशों को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। उन्होंने दावा किया कि दुश्मन देश केवल अपनी कमजोरी और थकान के कारण ही संघर्षविराम की बात कर रहे हैं।
मेजर जनरल अब्दोल्लाही ने ईरान की सड़कों पर उमड़े जनसैलाब का जिक्र करते हुए कहा कि जनता का सशस्त्र बलों के प्रति अटूट समर्थन ही उनकी असली ताकत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च कमांडर के निर्देशों के तहत ईरान की सेना, सरकार और जनता पूरी तरह एकजुट हैं। कमांडर ने चेतावनी दी कि दुश्मन की किसी भी धमकी या उकसावे वाली कार्रवाई का जवाब “निर्णायक, प्रभावी और त्वरित” होगा। तेहरान का यह बयान शांति वार्ता की मेज पर अपनी पकड़ मजबूत करने और वाशिंगटन को अपनी सैन्य सीमाओं से अवगत कराने की एक रणनीतिक कोशिश मानी जा रही है।
ईरानी कमांडर ने डोनाल्ड ट्रंप के बयानों को “झूठा और भ्रामक” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन सैन्य संघर्ष के दौरान शांति की आड़ लेकर जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिश कर रहा है। विशेष रूप से सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) के नियंत्रण और प्रबंधन को लेकर ईरान ने सख्त रुख अपनाया है। अब्दोल्लाही ने साफ किया कि ईरान अमेरिका को इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का भ्रम फैलाने की अनुमति नहीं देगा। उनके अनुसार, ईरान का समुद्र के इस अहम हिस्से पर पूर्ण नियंत्रण है और वह किसी भी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा।
इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता से पहले ईरान ने कूटनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर अपनी लक्ष्मण रेखा खींच दी है। मेजर जनरल अब्दोल्लाही ने कहा कि यदि भविष्य में किसी भी समझौते या अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया जाता है, तो ईरान उसका सक्षम तरीके से जवाब देने के लिए तैयार है। यह बयान स्पष्ट करता है कि ईरान केवल कागजी समझौतों पर भरोसा नहीं करेगा, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए हर स्तर पर सक्रिय रहेगा। तेहरान ने यह संदेश दे दिया है कि शांति की राह केवल तभी संभव है जब अमेरिका अपनी आक्रामक नीतियों और धमकियों का त्याग करे।
वर्तमान में इस्लामाबाद की ओर दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई हैं, लेकिन ईरान का कड़ा रुख वार्ता की सफलता पर संशय पैदा करता है। जहां एक तरफ कूटनीतिक मेज बिछाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ ड्रोन और मिसाइलों के परीक्षण माहौल को तनावपूर्ण बना रहे हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास की कमी दूर नहीं होती, तो खाड़ी क्षेत्र में शांति का यह अस्थायी प्रयास एक और बड़े सैन्य टकराव की शुरुआत साबित हो सकता है। फिलहाल, ईरानी सेना का “हाई अलर्ट” पर होना क्षेत्र में भविष्य की अनिश्चितता को दर्शा रहा है।
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