Iran-US Conflict
Iran-US Conflict: मध्य पूर्व में जारी खूनी संघर्ष के बीच शांति की तमाम कोशिशें धराशायी होती नजर आ रही हैं। पाकिस्तान, कतर और तुर्की जैसे देशों द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने के प्रयास पूरी तरह विफल हो गए हैं। ईरान ने अमेरिका द्वारा प्रस्तावित 48 घंटे के युद्धविराम (सीजफायर) के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। तेहरान ने न केवल बातचीत से इनकार किया, बल्कि अमेरिकी लड़ाकू विमानों को निशाना बनाकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। इस कड़े रुख के बाद अब खाड़ी क्षेत्र में पूर्ण युद्ध का खतरा और अधिक बढ़ गया है।
क्षेत्रीय शांति के लिए पाकिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक और सीजफायर पर बातचीत करने का जो खाका कतर और तुर्की ने तैयार किया था, उसे ईरान ने ठुकरा दिया है। अमेरिका ने 2 अप्रैल को एक मध्यस्थ के जरिए ईरान के सामने 48 घंटे के लिए युद्ध रोकने का प्रस्ताव रखा था ताकि मानवीय सहायता और कूटनीति के लिए रास्ता खुल सके। हालांकि, ईरान ने इसे अमेरिका की चाल बताते हुए किसी भी शर्त को मानने से साफ इनकार कर दिया है। ईरान का मानना है कि अमेरिका केवल समय प्राप्त करने के लिए यह प्रस्ताव दे रहा है।
सीजफायर के प्रस्ताव को खारिज करने के साथ ही ईरान ने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया है। ईरानी सेना ने पहले अपने हवाई क्षेत्र में अमेरिकी वायुसेना के F-15 स्ट्राइक ईगल को मार गिराया, और उसके तुरंत बाद सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट के पास A-10 थंडरबोल्ट को भी ढेर कर दिया। तेहरान ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि अब यह युद्ध उनकी शर्तों पर और तब खत्म होगा जब ईरान चाहेगा। इन हमलों ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य प्रभुत्व को सीधी चुनौती दी है।
शांति वार्ता के विफल होने का मुख्य कारण दोनों देशों की कठोर शर्तें हैं। अमेरिका ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने, परमाणु ठिकानों को बंद करने और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने की मांग की गई है। इसके बदले में अमेरिका प्रतिबंधों में ढील देने को तैयार था। दूसरी ओर, ईरान ने जवाबी 5 शर्तें रखी हैं, जिनमें मध्य पूर्व से अमेरिकी सैन्य ठिकानों की वापसी, होर्मुज स्ट्रेट पर ईरानी नियंत्रण की मान्यता और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा शामिल है।
28 फरवरी से शुरू हुए इस भीषण युद्ध को अब 36 दिन बीत चुके हैं। इन 36 दिनों में तबाही के आंकड़े डराने वाले हैं। अब तक ईरान के 1900 से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके हैं, जबकि इजराइल के 19 और अमेरिका के 13 सैनिकों की जान गई है। लेबनान में हिजबुल्लाह पर हुए हमलों में 1300 से अधिक लोग मारे गए हैं और 10 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं। मानवीय संकट गहराता जा रहा है और शरणार्थी शिविरों में बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव देखा जा रहा है।
युद्ध की आग अब पड़ोसी देशों तक भी पहुंचने लगी है। शुक्रवार की रात ईरान ने कुवैत की एक बड़ी तेल रिफाइनरी और जल शोधन संयंत्र (Desalination Plant) पर हमला किया, जिससे भारी वित्तीय नुकसान हुआ है। इस हमले का उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित करना और सहयोगी देशों पर दबाव बनाना माना जा रहा है। कतर और तुर्की अब दोहा या इस्तांबुल में नई शांति वार्ता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए दोनों ही पक्षों के झुकने की संभावना बहुत कम नजर आ रही है।
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