GIB Chick Birth
GIB Chick Birth : वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में 2026 का यह साल एक सुनहरे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। लुप्तप्राय प्रजाति ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (GIB), जिसे हिंदी में ‘सोन चिड़िया’ या महान भारतीय सारंग भी कहा जाता है, के संरक्षण में भारत को एक अभूतपूर्व सफलता मिली है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में लगभग दस साल के लंबे इंतजार के बाद जंगल में एक चूजे का जन्म हुआ है। यह घटना केवल एक पक्षी के जन्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विज्ञान और प्रकृति के बीच उस सफल तालमेल का प्रतीक है, जिसने विलुप्ति की कगार पर खड़ी एक प्रजाति को नई संजीवनी प्रदान की है।
इस सफलता की पटकथा राजस्थान के जैसलमेर स्थित ‘सम’ ब्रीडिंग सेंटर में लिखी गई थी। यहाँ से एक संरक्षित अंडे को लगभग 770 किलोमीटर दूर गुजरात के कच्छ के घास के मैदानों तक पहुँचाने का जोखिम भरा निर्णय लिया गया। 19 घंटे की इस लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा के दौरान अंडे की सुरक्षा सर्वोपरि थी। इसके लिए एक विशेष ‘हॉल्ट-फ्री कॉरिडोर’ तैयार किया गया ताकि बिना किसी झटके या देरी के अंडा अपने गंतव्य तक पहुँच सके। एक पोर्टेबल इनक्यूबेटर में सुरक्षित रखे गए इस अंडे को कच्छ के प्राकृतिक वातावरण में पहुँचाया गया, जहाँ एक ‘पालक मां’ (Foster Mother) उसका इंतजार कर रही थी।
कच्छ पहुँचने के बाद, इस अंडे को अत्यंत सावधानी से एक मादा बस्टर्ड के प्राकृतिक घोंसले में रखा गया। संरक्षणवादियों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह थी कि क्या मादा पक्षी इस बाहरी अंडे को स्वीकार करेगी। प्रकृति ने अपना चमत्कार दिखाया और मादा बस्टर्ड ने न केवल उस अंडे को अपनाया, बल्कि उसे सफलतापूर्वक सेया (Incubate) भी। 26 मार्च को जब उस अंडे से एक नन्हा चूजा बाहर निकला, तो विशेषज्ञों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। गुजरात में इस प्रजाति का पिछला सफल प्राकृतिक प्रजनन वर्ष 2016 में दर्ज किया गया था, जिसके बाद से यहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था।
गुजरात में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में अत्यंत दयनीय हो गई थी। साल 2018 में राज्य के अंतिम ज्ञात नर बस्टर्ड के लापता होने के बाद प्रजनन की सभी संभावनाएं लगभग समाप्त हो गई थीं। कच्छ के विशाल मैदानों में केवल तीन मादा पक्षी ही जीवित बची थीं। नर के अभाव में पिछले वर्षों में मादाओं द्वारा दिए गए सभी अंडे बांझ (Infertile) निकल रहे थे। स्थिति इतनी गंभीर थी कि यह प्रजाति गुजरात में स्थानीय रूप से विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी थी। ऐसे में राजस्थान से लाए गए अंडे के जरिए मिला यह जीवन इस प्रजाति के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने खुशी जाहिर की है। उन्होंने इस विशेष रणनीति को ‘जंपस्टार्ट अप्रोच’ का नाम देते हुए संरक्षण दल को बधाई दी। हालांकि, जन्म के शुरुआती कुछ घंटों में मां और चूजे के ओझल हो जाने से टीम की धड़कनें बढ़ गई थीं, लेकिन गहन निगरानी के बाद दोनों को सुरक्षित और स्वस्थ देखा गया। मंत्री ने कहा कि यह सफलता दर्शाती है कि यदि सही तकनीक और समर्पण के साथ प्रयास किए जाएं, तो प्रकृति की अनमोल धरोहरों को बचाया जा सकता है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड वर्तमान में ‘अत्यंत संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) श्रेणी में आता है। भारत में इनकी कुल संख्या 150 से भी कम रह गई है। कच्छ में चूजे के इस जन्म ने एक नई उम्मीद जगाई है कि कृत्रिम ब्रीडिंग और प्राकृतिक आवास के मेल से इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है। अब मुख्य चुनौती इस नन्हे चूजे को शिकारियों और बिजली की ऊँची लाइनों से सुरक्षित रखने की है। यदि यह चूजा वयस्क होने तक जीवित रहता है, तो यह गुजरात में इस प्रजाति के पुनरुद्धार की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। यह सफलता पूरी दुनिया के लिए वन्यजीव संरक्षण का एक मॉडल बन सकती है।
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