US Iran Tensions 2026
US Iran Tensions 2026: हिंद महासागर का शांत पानी इस समय अंतरराष्ट्रीय सैन्य गतिविधियों के कारण उबल रहा है। दुनिया के सबसे उन्नत और घातक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर, जिसे सैन्य विशेषज्ञ ‘समुद्री दानव’ की संज्ञा दे रहे हैं, की इस क्षेत्र में मौजूदगी ने युद्ध के नगाड़े बजा दिए हैं। जैसे-जैसे यह जंगी बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की धड़कनें तेज हो रही हैं। सैन्य जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस बार पूरी तरह से आक्रामक मूड में है, जिससे इन दोनों इस्लामिक देशों को अपने अस्तित्व और आंतरिक सुरक्षा पर संकट नजर आने लगा है।
अमेरिका के ईरान पर संभावित हमले की योजना से सबसे ज्यादा पसीना पाकिस्तान को आ रहा है। पाकिस्तान की चिंता का मुख्य केंद्र उसका अस्थिर बलूचिस्तान प्रांत है। दरअसल, पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है। ईरान का सिस्तान क्षेत्र और पाकिस्तान का बलूचिस्तान भौगोलिक और जातीय रूप से जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान को डर है कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश हुई या वहां गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी, तो बलूच विद्रोही सीमा पार की अस्थिरता का फायदा उठाकर अपनी गतिविधियों को उग्र कर देंगे। ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ के अनुसार, ईरान में किसी भी तरह की अस्थिरता पाकिस्तान के लिए सुरक्षा के लिहाज से विनाशकारी साबित हो सकती है।
एक तरफ पाकिस्तान विद्रोह से डरा हुआ है, तो दूसरी ओर तुर्की को ईरान से आने वाले लाखों शरणार्थियों की चिंता सता रही है। तेहरान में युद्ध की आशंका को देखते हुए तुर्की ने अपनी 560 किलोमीटर लंबी सीमा पर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं। तुर्की रक्षा मंत्रालय ने सीमा पर 380 किलोमीटर की कंक्रीट की दीवार, इलेक्ट्रो ऑप्टिकल टावर और गहरी खाइयां खोदकर एक मजबूत ‘फिजिकल बैरियर सिस्टम’ तैयार किया है। तुर्की किसी भी कीमत पर अवैध माइग्रेशन को रोकना चाहता है, क्योंकि वह पहले से ही सीरियाई शरणार्थियों के बोझ से दबा हुआ है।
इस वैश्विक संकट ने मुस्लिम देशों की एकजुटता के दावों की भी पोल खोल दी है। पाकिस्तान और तुर्की, जो अक्सर खुद को इस्लामिक दुनिया का मसीहा और रक्षक बताते रहे हैं, ईरान के मुद्दे पर पूरी तरह खामोश नजर आ रहे हैं। वहीं, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे शक्तिशाली खाड़ी देशों ने अमेरिका को स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान पर हमले के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे। यह स्थिति दर्शाती है कि एक साझा खतरे के बावजूद ये देश किसी एक नीति पर सहमत नहीं हो पाए हैं।
अमेरिकी बेड़े की तैनाती केवल ईरान को डराने के लिए नहीं, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व में अपनी बादशाहत कायम रखने की कोशिश है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो यह केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगी। इसका असर पूरे वैश्विक व्यापार मार्ग और तेल की कीमतों पर पड़ेगा। पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश फिलहाल केवल अपनी सीमाओं की रक्षा और आंतरिक हितों को बचाने में लगे हैं, जो उनके ‘इस्लामिक नेतृत्व’ के दावों पर सवालिया निशान लगाता है।
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