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Jagdeep Dhankar : संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों पर विवाद, संघ के समर्थने में उपराष्ट्रपति!

Jagdeep Dhankar : शिवराज, हिमंत, आरएसएस के बाद अब खुद देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की आवाज संविधान में बदलाव की मांग की है! शनिवार को एक कार्यक्रम में शामिल हुए धनखड़ ने संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया, “भारत के संविधान के अलावा किसी भी संविधान की प्रस्तावना में कभी बदलाव नहीं किया गया। क्योंकि संविधान की प्रस्तावना अपरिवर्तनीय है। फिर भी इसे बदलने का पाप आपातकाल के दौरान किया गया?”

उपराष्ट्रपति ने क्या कहा ?

कार्यक्रम में बोलते हुए धनखड़ ने कहा, “प्रस्तावना संविधान की आत्मा है। हमारे संविधान निर्माताओं ने यहां जो शब्द इस्तेमाल किए हैं, वे सोच-समझकर लिखे गए हैं। 1976 में आपातकाल लगाकर देशवासियों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे। तभी संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्द जोड़े गए।” इस घटना को देश के संविधान पर घाव बताते हुए धनखड़ ने कहा, “ऐसा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में नहीं हुआ है। भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां ऐसा हुआ है।

संविधान की भावना को लोगों की सहमति के बिना, बिना किसी चर्चा के बदल दिया गया।” धनखड़ ने यह भी कहा, “1975 भारतीय लोकतंत्र का एक काला दौर था। उस संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ कैदी थे। तो सोचिए यह संशोधन कितना बड़ा धोखा था। संसद कठपुतली बन गई थी, न्यायपालिका निष्क्रिय हो गई थी। ऐसे में संविधान में संशोधन करना गैरकानूनी व्यवहार जैसा था।”

आरएसएस के बयान के बाद  उठी मांग

गौरतलब है कि धनखड़ की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भाजपा नेताओं के साथ आरएसएस भी संविधान की प्रस्तावना में बदलाव की मांग कर रहा है। आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबेल ने कहा कि 1976 में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए थे। उस समय देश में आपातकाल की स्थिति थी। अंबेडकर द्वारा लिखे गए संविधान में ये दोनों शब्द नहीं थे। इसलिए इन्हें अब हटा दिया जाना चाहिए। ऐसे में जानकारों का मानना ​​है कि उपराष्ट्रपति की टिप्पणी न केवल आरएसएस के लिए समर्थन है, बल्कि संविधान में बदलाव की भी जोरदार मांग है।

संयोग से, 1976 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लाए गए संशोधन के परिणामस्वरूप संविधान की प्रस्तावना में दो शब्द जोड़े गए थे। परिणामस्वरूप, भारत एक ‘संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य’ से ‘संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य’ में बदल गया। पिछले साल, पूरे देश में आपातकाल की स्थिति घोषित की गई थी। उस समय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें चुनाव धोखाधड़ी का दोषी पाया था। और उन्हें छह साल के लिए संसद से निष्कासित कर दिया था। उसके बाद, प्रधान मंत्री ने आपातकाल की स्थिति घोषित कर दी।

संवैधानिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता निलंबित कर दी गई। मीडिया पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए गए। इस साल आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपातकाल की आलोचना करते हुए इसे ‘भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक’ बताया और कांग्रेस पर निशाना साधा। हर साल, भाजपा इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाती है।

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