Ladakh Border Dispute : भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। लद्दाख के 28 रणनीतिक स्थानों और भौगोलिक क्षेत्रों के मानकीकृत नाम तय करने के भारत के फैसले पर चीन ने आपत्ति जताई है। इस मामले पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते। उन्होंने जोर दिया कि यदि भारत और चीन द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो सीमा पर सौहार्द बनाए रखना बेहद जरूरी है।
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में जयशंकर ने क्या कहा?
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में भारत-चीन संबंधों पर चर्चा के दौरान विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों के लिए सीमा पर स्थिरता आवश्यक है। उनके मुताबिक, चीन के साथ संबंधों के दूसरे पहलुओं में प्रगति तभी संभव है, जब सीमा पर शांति बनी रहे। जयशंकर का संदेश स्पष्ट था कि सीमा पर तनाव और द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति एक साथ आगे नहीं बढ़ सकते। भारत चाहता है कि दोनों पक्ष सीमा पर स्थिरता बनाए रखने के लिए अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें।
सीमा विवाद दशकों पुराना, 2020 की घटनाओं ने बदले हालात
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा का अब तक आपसी सहमति से पूरा निर्धारण नहीं हुआ है। यह विवाद नया नहीं है, बल्कि कई दशकों से चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि 1975 से 2020 तक लगभग 45 वर्षों के दौरान सीमा पर किसी सैनिक की जान नहीं गई थी। इस अवधि में दोनों देशों के संबंधों में सुधार भी हुआ और विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क आगे बढ़ा।
हालांकि, वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान सीमा पर कई घटनाएं हुईं। इसके बाद भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें दोनों पक्षों के सैनिकों की मौत हुई। जयशंकर के अनुसार, यह घटनाक्रम 1975 के बाद बनी स्थिति से बड़ा बदलाव था। भारत का रुख है कि सीमा पर शांति भंग होने का असर दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर पड़ना स्वाभाविक है।
2024 से सीमा पर स्थिति में सुधार का दावा
जयशंकर ने कहा कि सीमा पर तनाव कम करने और स्थिरता बहाल करने के लिए भारत और चीन को चार साल से अधिक समय तक बातचीत करनी पड़ी। उनके मुताबिक, 2024 से सीमा पर हालात काफी हद तक सामान्य होने लगे। इसके साथ ही दोनों देशों के संबंधों को भी सामान्य स्थिति की ओर ले जाने की कोशिशें आगे बढ़ीं।
विदेश मंत्री के बयान का मुख्य संदेश यह है कि सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय संबंध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि दोनों देश व्यापार, कूटनीति और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहते हैं, तो सीमा पर शांति बनाए रखना प्राथमिकता होनी चाहिए।
लद्दाख के 28 स्थानों के नाम पर चीन ने जताई आपत्ति
भारत के गृह मंत्रालय की ओर से लद्दाख के 28 रणनीतिक स्थानों और भौगोलिक क्षेत्रों के मानकीकृत नाम तय किए जाने के बाद चीन ने इसका विरोध किया। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में भारत के इस कदम पर आपत्ति जताई।
माओ निंग ने कहा कि चीन भारत द्वारा बनाए गए तथाकथित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को मान्यता नहीं देता। उन्होंने भारत के इस कदम को अवैध और अमान्य बताते हुए दावा किया कि पश्चिमी क्षेत्र में संबंधित इलाके चीन के हैं। चीन का कहना है कि नाम तय करने की इस प्रक्रिया से उसके क्षेत्रीय दावे नहीं बदलेंगे।
भारत-चीन सीमा विवाद में आगे क्या होगा?
लद्दाख के स्थानों के नामकरण को लेकर चीन की आपत्ति और जयशंकर का बयान दोनों देशों के बीच सीमा विवाद की संवेदनशीलता को सामने लाते हैं। भारत की ओर से सीमा पर शांति को सामान्य संबंधों की जरूरी शर्त बताया गया है, जबकि चीन ने नामकरण के फैसले को चुनौती दी है।
अब इस मामले में दोनों देशों के अगले कूटनीतिक कदम महत्वपूर्ण होंगे। सीमा पर स्थिरता बनाए रखने, बातचीत जारी रखने और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के प्रयासों पर क्षेत्रीय स्थिति का असर पड़ सकता है। फिलहाल, दोनों देशों के आधिकारिक बयानों से स्पष्ट है कि सीमा विवाद उनके संबंधों का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
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