Jharkhand Politics
झारखंड की राजनीति में इन दिनों तेज हलचल मची हुई है, जिसकी शुरुआत एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। 14 नवंबर को बिहार चुनाव परिणाम घोषित होने के ठीक तीन दिन बाद, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक ने सोशल मीडिया पर एक संक्षिप्त लेकिन विस्फोटक पोस्ट किया: “रांची. अब नया बम झारखंड में हेमंत अब जीवंत होंगे…” इस एक लाइन ने पूरे झारखंड का राजनीतिक तापमान एकाएक बढ़ा दिया। तभी से यह कयास लगने लगे थे कि राज्य की गठबंधन सरकार (महागठबंधन) में कुछ बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल हो सकता है।
बिहार चुनाव के दौरान सीट शेयरिंग को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और महागठबंधन के अन्य दलों के बीच गहरी तनातनी रही थी। बिहार की सीमा से लगी 12 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा करने वाला झामुमो जब सीटें हासिल नहीं कर सका, तो उसने सीधा चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया था। उस घटनाक्रम के बाद से ही सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म थी कि – “बिहार की हार, झारखंड की राजनीति बदल देगी!” अजय आलोक के पोस्ट ने इसी पृष्ठभूमि को आधार दिया और झारखंड की सियासी कहानी अब क्रमवार आगे बढ़ती जा रही है।
झारखंड महागठबंधन में दरार की पृष्ठभूमि असल में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ही बननी शुरू हो गई थी। बिहार चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर झामुमो और महागठबंधन के घटक दलों के बीच समन्वय की भारी कमी दिखाई दी, जो भविष्य के संबंधों के लिए एक नकारात्मक संकेत था। झामुमो बिहार-झारखंड सीमा से सटी 12 सीटों पर चुनाव लड़ने का मजबूत दावा कर रहा था, लेकिन दूसरी ओर महागठबंधन ने झामुमो को किसी भी प्रकार की तवज्जो नहीं दी।
शुरुआत में चर्चा यह भी हुई थी कि जेएमएम को 3 सीटें दिए जाने पर सहमति बन गई है, लेकिन अचानक खबर आई कि झामुमो ने बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया है। महागठबंधन में सीटें नहीं मिलने पर जेएमएम ने उम्मीदवार खड़े नहीं किए और बिहार चुनाव के बाद झारखंड में गठबंधन को लेकर समीक्षा (Review) की बात कही थी। बिहार में महागठबंधन को करारी हार मिलने के बाद, अजय आलोक के इस पोस्ट ने झारखंड में सियासी सरगर्मी को तेज करने का काम किया है।
बिहार चुनाव के घटनाक्रम के बाद की गतिविधियों ने इस सियासी सस्पेंस को और मजबूत किया है। भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की लगातार चुप्पी, और फिर महागठबंधन के मुद्दों पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की लंबी खामोशी ने संशय का माहौल पैदा किया। इन सबके बीच, मुख्यमंत्री का अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ दिल्ली दौरा और वहां कथित तौर पर भाजपा नेताओं से गुप्त मुलाकातों की खबरें सामने आईं, जिसने कयासों को सियासी कहानी का रूप दे दिया।
दरअसल, मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरी पिछले कुछ दिनों से साफ-साफ दिख रही है। मुख्यमंत्री के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘सरकार आपके द्वार’ में उनकी अनुपस्थिति और कार्यक्रम का कैंसिल होना भी कुछ बड़े संकेत दे रहा था। गौरतलब है कि पिछले साल इसी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री स्वयं जिला-जिला जाते थे और दावा करते थे कि सरकार AC कमरे से नहीं, बल्कि गांव से चल रही है, लेकिन इस बार किसी जिले में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम नहीं हुआ।
गठबंधन में असहजता की बात को और आगे तब बल मिला जब दुमका में फ्लाईंग इंस्टिट्यूट के उद्घाटन कार्यक्रम के मौके पर सीएम हेमंत सोरेन के मंच से सहयोगी कांग्रेस एवं राजद के मंत्री और विधायक नदारद रहे। इससे पहले, मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित सरकारी कार्यक्रमों में दोनों दल के मंत्री मौजूद रहते थे। इसके आगे की कहानी तब बढ़ी जब मोरहाबादी मैदान में नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम के पोस्टर से राजद और कांग्रेस के नेताओं के पोस्टर हटा दिए गए।
इन पोस्टरों से नेताओं की तस्वीर नहीं लगने के बाद कांग्रेस और राजद के कुछ नेताओं के बीच यह बात गंभीर चर्चा का विषय रही। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की लंबी चुप्पी, पत्नी कल्पना सोरेन के साथ दिल्ली में कई दिनों तक रहना और वहां भाजपा नेताओं के साथ कथित गोपनीय मुलाकातों की खबरों ने, गठबंधन में असहजता के संकेतों को मजबूत किया है। फिलहाल स्थिति साफ नहीं है और न ही किसी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि हुई है, लेकिन सत्ता गलियारों की भाषा बताती है कि झारखंड की राजनीति अगले कुछ दिनों तक शांत नहीं रहने वाली।
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