Justice Suryakant Controversy
Justice Suryakant Controversy : हाल ही में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की एक तल्ख टिप्पणी के बाद कानूनी, सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े गलियारों में बहस तेज हो गई है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ द्वारा विकास कार्यों में बाधा डालने वाली जनहित याचिकाओं की आलोचना किए जाने के बाद पूर्व नौकरशाहों, वकीलों, पर्यावरणविदों और नागरिक समाज के समूहों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस मामले में देश के प्रधान न्यायाधीश को अलग-अलग सामाजिक और कानूनी संगठनों द्वारा खुली चिट्ठियां लिखी गई हैं, जिनमें अदालत की इस टिप्पणी पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है और इसे जनहित के खिलाफ बताया गया है।
यह पूरा विवाद करीब दो हफ्ते पुराना है, जो 11 मई को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई से शुरू हुआ था। उस दिन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ गुजरात के पिपावाव बंदरगाह के विस्तार को दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ दायर एक विशेष याचिका पर विचार कर रही थी। सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के तर्कों पर चर्चा हो रही थी, तब पीठ ने देश में चल रही विभिन्न विकास परियोजनाओं को अदालतों में बार-बार चुनौती देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अपनी गंभीर नाराजगी और असंतोष व्यक्त किया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने बेहद कड़े शब्दों में याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे देश की एक भी ऐसी बड़ी परियोजना का नाम बताएं, जिसका इन तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने खुलकर स्वागत किया हो या समर्थन किया हो। पीठ ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए आगे कहा कि आजकल हर छोटे-बड़े प्रशासनिक फैसले को अदालत में घसीट लाने की परिपाटी बन गई है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जिस तरह की याचिकाएं आजकल दायर हो रही हैं, उनका मुख्य उद्देश्य केवल बुनियादी ढांचे के विकास को रोकना है, जिससे देश की प्रगति बाधित होती है।
सीजेआई की इन टिप्पणियों के विरोध में पूर्व सिविल सेवकों के एक प्रतिष्ठित मंच ‘कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप’ (CCG) के 71 पूर्व नौकरशाहों ने एक खुली चिट्ठी जारी की है। इस पत्र में उन्होंने चिंता जताई है कि देश की सर्वोच्च अदालत की ऐसी मौखिक टिप्पणियों से पर्यावरण संरक्षण के नियम और सुरक्षा उपाय बेहद कमजोर हो सकते हैं। उनका तर्क है कि शीर्ष अदालत के इस रुख को देखकर देश की निचली अदालतें और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भी पर्यावरण से जुड़े मामलों के प्रति ऐसा ही उपेक्षित और सख्त रुख अपना सकती हैं, जो पारिस्थितिकी के लिए घातक होगा।
पूर्व नौकरशाहों ने अपनी चिट्ठी में सरकारी तंत्र की कमियों को भी उजागर किया है। उनका कहना है कि पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले ज्यादातर विशेषज्ञ निकाय और समितियां केवल सरकारी अधिकारियों से भरी होती हैं, जो अक्सर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पातीं और रबर स्टैंप की तरह स्वीकृतियां देती हैं। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट को इन निकायों की रिपोर्टों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि नागरिकों द्वारा उठाए गए वास्तविक मुद्दों की गहराई से जांच करनी चाहिए।
इसके समानांतर, देश के 600 से अधिक जागरूक नागरिकों, प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं, 72 वकीलों और कानून के छात्रों ने भी मुख्य न्यायाधीश को एक अलग संयुक्त पत्र भेजा है। इस पत्र के माध्यम से मांग की गई है कि अदालत अपनी इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से वापस ले। उनका मुख्य तर्क यह है कि ऐसी टिप्पणियों से पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले नागरिकों को समाज में संदिग्ध या विकास विरोधी की श्रेणी में खड़ा किए जाने का एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
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