कृषि

Jute Price Hike: देश में कच्चे जूट के दामों में भारी उछाल, संकट में जूट मिलें और मजदूर

Jute Price Hike: भारत का ऐतिहासिक जूट उद्योग इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। देश में कच्चे जूट की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने मिल मालिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। कच्चे माल की भारी कमी के कारण जूट मिलों को अपना संचालन जारी रखना असंभव होता जा रहा है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए ‘इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन’ (IJMA) ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। संस्था का मानना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह पारंपरिक उद्योग पूरी तरह से धराशायी हो सकता है, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था और निर्यात पर भी पड़ेगा।

निजी व्यापार पर रोक लगाने की पुरजोर मांग

IJMA ने सरकार को एक कड़ा सुझाव देते हुए कहा है कि 1 अप्रैल के बाद निजी व्यापारियों को कच्चे जूट की खरीद और बिक्री की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। एसोसिएशन का आरोप है कि बड़े निजी व्यापारी जूट की भारी जमाखोरी कर रहे हैं, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो गई है और कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ रही हैं। यदि निजी व्यापार पर अंकुश लगाया जाता है, तो कच्चा जूट सीधे मिलों तक उचित दाम पर पहुँच सकेगा और बिचौलियों का वर्चस्व समाप्त होगा।

13,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँची कीमतें

वर्तमान स्थिति यह है कि दिसंबर 2025 के अंत तक कई मिलों का स्टॉक पूरी तरह समाप्त हो चुका है। कच्चे जूट की कीमतें बढ़कर लगभग 13,000 रुपये प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं। इतनी अधिक लागत पर उत्पादन करना मिलों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। जूट की यह कमी न केवल कीमतों को प्रभावित कर रही है, बल्कि मिलों की उत्पादन क्षमता को भी सीमित कर रही है, जिससे भविष्य में जूट के बोरों की आपूर्ति में बाधा आ सकती है।

75 हजार मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट

जूट उद्योग का यह संकट केवल मिल मालिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे मानवीय और दुखद पहलू मजदूरों पर पड़ रहा है। कच्चे माल की कमी के कारण कई मिलें या तो बंद हो गई हैं या अपनी क्षमता से बहुत कम पर चल रही हैं। इसका सीधा असर लगभग 75,000 से अधिक मजदूरों पर पड़ा है, जो आज बेरोजगार होने की कगार पर हैं। काम बंद होने से इन मजदूरों के परिवारों के सामने भरण-पोषण की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।

सरकार से नियंत्रण और JCI की भूमिका पर जोर

IJMA का प्रस्ताव है कि व्यापारियों को 31 मार्च तक अपना मौजूदा स्टॉक बेचने का समय दिया जाए, जिसके बाद सरकार पूरी व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले ले। संस्था चाहती है कि व्यापारियों के पास बचे हुए जूट को ‘जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ (JCI) खरीदे। इसके बाद JCI ही मिलों की आवश्यकता के अनुसार जूट का आवंटन करे। इससे न केवल कीमतों में स्थिरता आएगी, बल्कि जूट मिलों को निर्बाध रूप से कच्चा माल मिलता रहेगा।

भविष्य की सुरक्षा और अनाज भंडारण पर असर

यदि सरकार IJMA के सुझावों को लागू करती है, तो जूट की कीमतें स्थिर होने की उम्मीद है। इससे जूट मिलें बिना किसी रुकावट के काम कर पाएंगी, जिससे आने वाले समय में अनाज भंडारण के लिए आवश्यक जूट के बोरों (गन बैग्स) का उत्पादन समय पर हो सकेगा। इससे सरकार को भी सही कीमत पर बोरों की आपूर्ति सुनिश्चित होगी, जो कृषि क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सामूहिक बैठक में जताई गई गहरी चिंता

14 जनवरी 2026 को आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में सरकार के प्रतिनिधियों, मजदूर संगठनों और उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने इस संकट पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में सर्वसम्मति से यह माना गया कि जूट उद्योग इस समय आईसीयू (ICU) में है। सभी पक्षों ने चेतावनी दी है कि यदि अगले कुछ हफ्तों में ठोस नीतिगत निर्णय नहीं लिए गए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

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