Kailas Nath Wanchoo: भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के शपथ ग्रहण के बीच सोशल मीडिया पर अचानक पूर्व CJI कैलास नाथ वांचू सुर्खियों में आ गए हैं। वांचू भारतीय न्यायिक इतिहास में एकमात्र ऐसे मुख्य न्यायाधीश रहे जिन्हें लॉ की डिग्री प्राप्त नहीं थी। शुरुआती दौर में वे भारतीय सिविल सेवा (ICS) के अधिकारी थे और लंबे न्यायिक अनुभव के आधार पर देश की सर्वोच्च न्यायिक कुर्सी तक पहुंचे।

Kailas Nath Wanchoo: जन्म और प्रारंभिक जीवन
25 फरवरी 1903 को जन्मे कैलास नाथ वांचू की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अत्यंत प्रभावशाली थी। उनके व्यक्तित्व के विकास में उनकी उच्च शिक्षा और वैचारिक दृष्टि का विशेष योगदान रहा। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई कानपुर के Pandit Pirthi Nath High School से की।स्कूल शिक्षा के बाद वांचू ने Muir Central College, प्रयागराज से बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) की डिग्री हासिल की। इसके पश्चात वे Wadham College, ऑक्सफोर्ड गए, जहाँ उन्होंने उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन किया। उनकी यह उपलब्धि उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में आगे बढ़ाने में सहायक बनी।
Kailas Nath Wanchoo: ICS में चयन और प्रारंभिक सेवा
वांचू की बुद्धिमत्ता और ज्ञान के चलते उनका चयन वर्ष 1924 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) में हुआ। उन्होंने 1 दिसंबर 1926 को अपने प्रशासनिक करियर की शुरुआत की। सेवा के आरंभिक वर्षों में वे उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में जॉइंट मजिस्ट्रेट और बाद में डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज बने।अपनी सादगी, ईमानदारी और सूक्ष्म न्यायिक दृष्टि के कारण वांचू को लगातार महत्वपूर्ण दायित्वों पर नियुक्त किया गया। अदालतों में उनके निर्णय और प्रशासनिक कार्यशैली में पारदर्शिता तथा संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से दिखती थी, जिसके कारण वे एक सम्मानित न्यायिक अधिकारी के रूप में स्थापित हुए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज की नियुक्ति
फरवरी 1947 में वांचू को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया गया। वे जनवरी 1951 तक इस पद पर रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में न्यायिक सिद्धांतों को मजबूत किया और अदालत की विश्वसनीयता बढ़ाई।वांचू 1951 से 1958 तक राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। इस अवधि में उन्होंने न्यायिक सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता और नीति-निर्माण से जुड़े अनेक ऐतिहासिक फैसले दिए। उनके नेतृत्व में राजस्थान हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण विधिक आयाम स्थापित किए।
आयोगों और समितियों में अहम भूमिका
अपने न्यायिक करियर के दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण आयोगों और समितियों की जिम्मेदारी सौंपी गई। इनमें प्रमुख हैं:
अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश न्यायिक सुधार समिति (1950–51)
आंध्र राज्य के पुनर्गठन के प्रशासनिक प्रभावों पर रिपोर्ट (1953)
इंदौर फायरिंग जांच आयोग के एकल-सदस्य (1954)
धौलपुर उत्तराधिकार प्रकरण आयोग के अध्यक्ष (1955)
भारत का विधि आयोग – सदस्य (1955)
इन दायित्वों ने वांचू को भारत के विधिक और प्रशासनिक ढांचे के प्रमुख निर्माताओं में शामिल किया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने का गौरव
कैलास नाथ वांचू की प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए 12 अप्रैल 1967 को उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) नियुक्त किया गया। उन्होंने यह सर्वोच्च पद 24 फरवरी 1968 तक संभाला। लॉ की डिग्री न होने के बावजूद उनका न्यायिक कौशल, विवेक और निष्पक्षता उन्हें भारतीय न्यायपालिका में अद्वितीय स्थान देता है।
भारतीय न्यायपालिका में स्थायी छाप
कैलास नाथ वांचू को उनकी ईमानदारी, निष्पक्ष दृष्टिकोण, प्रशासनिक समझ और संवैधानिक मूल्यों के प्रति समर्पण के लिए हमेशा याद किया जाता है। वे उन हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने बिना औपचारिक विधिक शिक्षा के भी न्याय के सिद्धांतों को नई ऊँचाइयाँ दीं और भारतीय न्यायपालिका में अमिट छाप छोड़ी।
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