Kannappa Nayanar Story: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, भक्ति और साधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में भक्त भोलेनाथ को जल, दूध, गंगाजल और बेलपत्र अर्पित करते हैं। लेकिन भगवान शिव के कुछ ऐसे भक्त भी हुए हैं, जिनकी भक्ति ने पूजा की पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़कर प्रेम और समर्पण का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे ही महान भक्तों में कन्नप्पा नयनार का नाम प्रमुख है। मान्यता है कि कन्नप्पा को पूजा की विधि और धार्मिक नियमों का ज्ञान नहीं था, लेकिन भगवान शिव के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी आंख तक भोलेनाथ को समर्पित करने का संकल्प ले लिया था।

पेरिया पुराणम और बसव पुराणम में मिलता है कन्नप्पा का वर्णन
कन्नप्पा नयनार की कथा मुख्य रूप से तमिल ग्रंथ पेरिया पुराणम और तेलुगु ग्रंथ बसव पुराणम में वर्णित है। इन ग्रंथों के अनुसार कन्नप्पा एक शिकारी समुदाय से संबंध रखते थे। उनका जीवन जंगलों में शिकार करते हुए बीतता था और वह अपने परिवार का पालन-पोषण इसी से करते थे। उन्हें पूजा-पाठ की परंपरागत विधियों, मंत्रों और धार्मिक नियमों की जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद उनके मन में भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और निष्कपट प्रेम था।

शिवलिंग के दर्शन से जागी भगवान शिव के प्रति भक्ति
धार्मिक कथाओं के अनुसार एक दिन शिकार करते हुए कन्नप्पा जंगल के बीच एक स्थान पर पहुंचे, जहां उन्हें भगवान शिव का शिवलिंग दिखाई दिया। यह स्थान वर्तमान आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। शिवलिंग को देखते ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न हो गई। इसके बाद वह प्रतिदिन वहां जाने लगे और अपने सरल तरीके से भगवान शिव की पूजा करने लगे।
अनजान विधियों के बावजूद कन्नप्पा की भक्ति थी सच्ची
कन्नप्पा को यह जानकारी नहीं थी कि भगवान शिव की पूजा किस विधि से की जाती है। वह न मंत्र जानते थे और न ही पूजा के नियम। वह जंगल से मिलने वाली चीजों को ही भगवान शिव को अर्पित करते थे। कथा के अनुसार, वह शिकार से प्राप्त भोजन भगवान को चढ़ाते थे और शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए अपने मुंह में पानी भरकर लाते थे। वह फूल-पत्तियां भी अपने भाव के अनुसार चढ़ाते थे। उनके लिए पूजा का आधार विधि नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति प्रेम और समर्पण था।
पुजारी को कन्नप्पा की पूजा से हुई चिंता
जिस स्थान पर शिवलिंग स्थापित था, वहां एक पुजारी भी नियमित रूप से भगवान शिव की पूजा किया करते थे। जब वह मंदिर पहुंचते तो शिवलिंग पर चढ़ाई गई वस्तुओं को देखकर परेशान हो जाते थे। उन्हें लगता था कि कोई भगवान शिव का अपमान कर रहा है। शुरुआत में उन्होंने इसे किसी जंगली जानवर का कार्य समझा, लेकिन जब यह रोज होने लगा तो उन्हें इसके पीछे किसी इंसान के होने का पता चला। कथा के अनुसार भगवान शिव ने पुजारी को सपने में बताया कि यह सब उनका एक अनन्य भक्त कन्नप्पा कर रहा है, जो पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन उसका प्रेम सच्चा है।

कन्नप्पा ने भगवान शिव के लिए अपनी आंख कर दी समर्पित
एक दिन जब कन्नप्पा शिवलिंग की पूजा कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से खून बह रहा है। यह देखकर वह बेहद दुखी हो गए और अपनी समझ के अनुसार उसे ठीक करने का प्रयास करने लगे। जब कोई उपाय सफल नहीं हुआ तो उन्होंने अपनी आंख भगवान शिव को अर्पित करने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार उन्होंने अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग पर चढ़ा दी, जिससे रक्त बहना बंद हो गया।
इसके बाद जब शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त निकलने लगा तो कन्नप्पा ने अपनी दूसरी आंख भी अर्पित करने का फैसला कर लिया। उन्होंने अपने पैर के अंगूठे से उस स्थान को चिन्हित किया, जहां दूसरी आंख रखनी थी, ताकि आंख खोने के बाद भी वह सही स्थान पहचान सकें। जैसे ही वह अपनी दूसरी आंख अर्पित करने वाले थे, भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए।
भगवान शिव ने प्रसन्न होकर दिया कन्नप्पा को आशीर्वाद
भगवान शिव कन्नप्पा की इस अद्भुत भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें रोक दिया। उन्होंने कन्नप्पा को उनकी आंखें वापस प्रदान कीं और उन्हें अपने परम भक्तों में स्थान दिया। मान्यता है कि भगवान शिव ने ही थिन्नन को कन्नप्पा नाम दिया। उनकी कथा यह संदेश देती है कि भगवान के लिए बाहरी दिखावे और पूजा की विधि से अधिक महत्व भक्त के सच्चे मन और समर्पण का होता है।
श्रीकालहस्ती मंदिर से जुड़ी है कन्नप्पा की अमर कथा
कन्नप्पा नयनार की भक्ति कथा आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती मंदिर से जुड़ी हुई है। यह मंदिर भगवान शिव के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल है और पंचभूत स्थलों में वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। आज भी यहां कन्नप्पा स्वामी की भक्ति को श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। सावन के महीने में शिव भक्तों के लिए कन्नप्पा नयनार की कथा प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण बनी रहती है।











