Karnataka
Karnataka Congress Crisis: कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता के बंटवारे को लेकर जारी खींचतान अब कांग्रेस आलाकमान के दरबार तक पहुँच गई है। शनिवार को शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि पार्टी हाई कमान ने दोनों शीर्ष नेताओं को दिल्ली आने का संकेत दिया है, जिससे राज्य में ‘ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री’ वाले फॉर्मूले पर चर्चा फिर से गर्म हो गई है।
उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि दिल्ली से फोन आया है। उन्होंने कहा, “हाई कमान ने हम दोनों को सूचित किया है कि वे हमें बुलाएंगे। जैसे ही समय तय होगा, हम दिल्ली जाकर मुलाकात करेंगे।” शिवकुमार ने पारदर्शिता बरतने का भरोसा देते हुए कहा कि वे मीडिया को बताए बिना कोई कदम नहीं उठाएंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विधानसभा सत्र समाप्त होने वाला है और सबकी नजरें दिल्ली में होने वाली इस बड़ी बैठक पर टिकी हैं।
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विधानसभा में जोर देकर कहा कि वे अपने पद पर बने रहेंगे। उन्होंने सत्ता साझा करने के किसी भी कथित समझौते की अफवाहों को खारिज करते हुए दावा किया कि कांग्रेस आलाकमान का उन्हें पूरा समर्थन प्राप्त है। सिद्धारमैया का यह बयान शिवकुमार खेमे के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि मई 2023 में सरकार बनने के समय से ही यह चर्चा थी कि कार्यकाल के मध्य में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है।
20 नवंबर को कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के ढाई साल (मध्य चरण) पूरे कर लिए हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक गुप्त समझौता हुआ था, जिसके तहत सिद्धारमैया को पहले ढाई साल और शिवकुमार को शेष कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनाया जाना था। हालांकि, सिद्धारमैया के करीबी मंत्रियों का कहना है कि पार्टी ने उन्हें पूरे पांच साल के लिए विधायक दल का नेता चुना है, इसलिए नेतृत्व बदलने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
शनिवार को शिवकुमार ने वरिष्ठ विधायक और सिद्धारमैया के वफादार माने जाने वाले के.एन. राजन्ना से मुलाकात की। राजन्ना का रुख इस विवाद में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सिद्धारमैया को पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहना चाहिए। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि यदि शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं, तो वे उनके मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होंगे। राजन्ना ने ‘एक व्यक्ति-एक पद’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए शिवकुमार से प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने और तीन नए उपमुख्यमंत्री बनाने की भी मांग की है।
भले ही राजनीतिक चर्चाएं नेतृत्व परिवर्तन पर केंद्रित हों, लेकिन शिवकुमार ने अपने दिल्ली दौरे को आधिकारिक बताया है। उन्होंने कहा कि वे मंगलवार को दिल्ली जाएंगे और जल संसाधन मंत्री के रूप में महादायी, कृष्णा और मेकेदातु जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर केंद्रीय मंत्रियों के साथ बैठक करेंगे। उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिलने की बात कही है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विकास कार्यों के बहाने असली चर्चा मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर ही होगी।
कर्नाटक कांग्रेस के भीतर का यह आंतरिक संघर्ष पार्टी की छवि को प्रभावित कर सकता है। एक तरफ सिद्धारमैया का अनुभव और जनसमर्थन है, तो दूसरी तरफ शिवकुमार की संगठनात्मक शक्ति और निष्ठा। आलाकमान के लिए चुनौती एक ऐसा समाधान निकालने की है जिससे दोनों नेता संतुष्ट रहें और सरकार की स्थिरता पर कोई आंच न आए। आने वाले कुछ दिन कर्नाटक की राजनीति के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।
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