Karnataka Congress
Karnataka Congress : देश के पांच प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होते ही कर्नाटक की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर अंदरूनी खींचतान अचानक तेज हो गई है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा दिए गए एक ताजा और रहस्यमयी बयान ने कांग्रेस के भीतर ढाई-ढाई साल के कथित सत्ता समझौते की सुगबुगाहट को दोबारा हवा दे दी है। शिवकुमार ने गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए साफ तौर पर कहा कि आने वाला समय ही यह तय करेगा कि वह राज्य के मुख्यमंत्री की कमान संभालेंगे या नहीं। उनके इस बयान के बाद सियासी पंडितों का मानना है कि पार्टी आलाकमान जल्द ही राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल और मुख्यमंत्री पद पर कोई बड़ा फैसला ले सकता है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य की सत्ता में अपने तीन साल का लंबा कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचने के बाद दोनों गुटों में तल्खी और बढ़ गई है। राजनैतिक सूत्रों से मिल रही पुख्ता जानकारी के अनुसार, कांग्रेस का शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व इस अंदरूनी कलह को और बढ़ने नहीं देना चाहता। यही वजह है कि पार्टी हाईकमान जल्द ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को देश की राजधानी नई दिल्ली तलब करने की योजना बना रहा है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों कद्दावर नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही रस्साकशी का एक सौहार्दपूर्ण और सर्वमान्य समाधान ढूंढना है, ताकि सरकार की स्थिरता पर कोई आंच न आए।
चामराजनगर में जब संवाददाताओं ने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर सीधा सवाल किया, तो उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में केवल इतना कहा, ”समय बताएगा”। भले ही शिवकुमार खुद खुलकर कुछ न बोल रहे हों, लेकिन उनके कट्टर समर्थक इस मुद्दे पर लगातार मुखर बने हुए हैं। शिवकुमार खेमे के विधायकों और नेताओं का पुरजोर दावा है कि साल 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली प्रचंड जीत के बाद, आलाकमान ने सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता-साझेदारी का एक गुप्त फॉर्मूला तय किया था। समर्थकों की मांग है कि उस वक्त किए गए वादे के अनुरूप अब राज्य सरकार की कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी जानी चाहिए।
कर्नाटक के राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से आम है कि सरकार गठन के समय आलाकमान ने दोनों नेताओं को संतुष्ट रखने के लिए एक विशेष समझौता किया था। अब जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं और अन्य राज्यों के आंतरिक सांगठनिक मसले भी सुलझ चुके हैं, तो शिवकुमार समर्थकों ने आलाकमान पर वादा निभाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। कर्नाटक कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का मानना है कि इस बार डीके शिवकुमार आसानी से पीछे हटने वाले नहीं हैं। ऐसे में अब पूरी राज्य इकाई और विपक्षी दलों की निगाहें कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के अगले कदम पर टिक गई हैं कि वह इस विवाद से कैसे निपटता है।
उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपनी बात को संतुलित करते हुए यह भी कहा कि वे पार्टी के एक बेहद अनुशासित और वफादार सिपाही हैं, इसलिए हाईकमान जो भी अंतिम निर्देश देगा, वे उसका अक्षरशः पालन करेंगे। हालांकि, उनके इस संयमित और शांत बयान के पीछे एक बहुत ही गहरा सियासी संदेश छिपा हुआ है। इस बयान ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खेमे में भारी खलबली और बेचैनी पैदा कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि यदि कांग्रेस आलाकमान ने समय रहते इस गुटीय कलह को बातचीत के जरिए शांत नहीं किया, तो आने वाले दिनों में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के लिए अपनी विकास योजनाओं को आगे बढ़ाना और सुचारू रूप से शासन चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
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