Kunal Kamra Supreme Court : कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर सात जजों की संविधान पीठ के सामने लंबित मामले में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है। यह मामला विधायिका के विशेषाधिकार और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संबंध से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ‘एन. रवि बनाम स्पीकर, तमिलनाडु विधानसभा’ मामले में 6 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करने वाली है।
महाराष्ट्र विधानसभा की कार्रवाई का दिया हवाला
कामरा ने अपनी अर्जी में कहा है कि महाराष्ट्र विधानसभा में उनके खिलाफ चल रही विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही इस संवैधानिक मुद्दे से सीधे जुड़ी हुई है। उनके खिलाफ कार्रवाई उनके कॉमेडी शो ‘नया भारत’ में प्रस्तुत किए गए एक व्यंग्यात्मक गीत के बाद शुरू हुई थी। कामरा का कहना है कि इस मामले में उठे सवाल विधायी विशेषाधिकार और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दे से संबंधित हैं।
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे पर था व्यंग्य
कुणाल कामरा के कार्यक्रम में वर्ष 2022 में शिवसेना में हुए विभाजन और उसके बाद महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक घटनाक्रम पर व्यंग्य किया गया था। कार्यक्रम में उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद से हटने और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनने के घटनाक्रम को लेकर टिप्पणी की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यंग्यात्मक प्रस्तुति में शिंदे के लिए ‘गद्दार’ शब्द का भी इस्तेमाल हुआ था।
महाराष्ट्र में विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई
व्यंग्यात्मक कार्यक्रम के बाद महाराष्ट्र विधानसभा में कामरा के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही शुरू की गई। इसके अलावा उनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया गया। कामरा ने इस आपराधिक मामले को रद्द कराने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है। हाईकोर्ट ने फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है, लेकिन मामले में अंतिम निर्णय अभी नहीं आया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ का तर्क
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में कामरा ने कहा है कि विधायी विशेषाधिकार का प्रभाव केवल पत्रकारों या प्रेस की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, इसका असर उन नागरिकों पर भी पड़ सकता है जो निर्वाचित प्रतिनिधियों या विधायकों के कामकाज पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते हैं। उन्होंने दलील दी है कि विशेषाधिकार कार्यवाही के इस्तेमाल से नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ यानी भय पैदा करने वाला प्रभाव पड़ सकता है।
कार्यक्रमों के लिए जगह मिलने में परेशानी का दावा
कामरा ने अपनी अर्जी में यह भी दावा किया है कि उनके खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद मुंबई में उनके कार्यक्रम आयोजित करने के लिए जगह हासिल करना मुश्किल हुआ है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाई का संभावित प्रभाव भविष्य में उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जो किसी विधानसभा सदस्य के कामकाज या राजनीतिक भूमिका पर टिप्पणी करना चाहते हैं। उन्होंने इसी आधार पर संवैधानिक पीठ के समक्ष अपनी दलील रखने की अनुमति मांगी है।
क्या है एन. रवि बनाम स्पीकर मामला?
‘एन. रवि बनाम स्पीकर, तमिलनाडु विधानसभा’ मामला करीब 23 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 2003 में तमिलनाडु विधानसभा की उस कार्रवाई से हुई थी, जो ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक संपादकीय से संबंधित थी। संपादकीय में तत्कालीन तमिलनाडु सरकार की कथित ‘बढ़ती असहिष्णुता’ की आलोचना की गई थी। इसके बाद विधानसभा ने अखबार के कई पत्रकारों और संपादकीय अधिकारियों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन तथा सदन की अवमानना से जुड़ी कार्रवाई की थी।
पत्रकारों को सुनाई गई थी जेल की सजा
विधानसभा ने तत्कालीन संपादक एन. रवि, कार्यकारी संपादक मालिनी पार्थसारथी, प्रकाशक एस. रंगराजन, ब्यूरो प्रमुख वी. जयंथ और विशेष संवाददाता राधा वेंकटेशन को 15 दिन की जेल की सजा देने का प्रस्ताव पारित किया था। उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए गए थे। हालांकि, पत्रकारों की गिरफ्तारी नहीं हुई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
मामला सात जजों की पीठ तक कैसे पहुंचा?
8 दिसंबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामले में संविधान के अनुच्छेद 194(3) की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न मौजूद हैं। साथ ही इसका संबंध अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी है। पहले मामला पांच जजों की पीठ के सामने भेजा गया। बाद में 2004 में संभावित न्यायिक मतभेदों को देखते हुए इसे सात जजों की पीठ को सौंप दिया गया।
6 अक्टूबर से शुरू होगी अहम सुनवाई
अब सात जजों की संविधान पीठ विधायी विशेषाधिकार और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक सीमाओं की जांच करेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले की सुनवाई 6 अक्टूबर से शुरू होगी और 15 अक्टूबर तक दलीलें पूरी करने का प्रस्ताव है। कुणाल कामरा की ओर से अधिवक्ता आरती राघवन ने अर्जी तैयार की है, जिसे अधिवक्ता मानसी बिंजराजका के माध्यम से दाखिल किया गया है। उनकी मांग है कि उन्हें इस महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पर अपना पक्ष रखने की अनुमति दी जाए।
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