Supreme Court Decision : भारतीय समाज में आज भी विवाह-पूर्व संबंधों को लेकर एक संकुचित दृष्टिकोण देखने को मिलता है। अक्सर यदि किसी युवक या युवती के शादी से पहले किसी के साथ प्रेम या शारीरिक संबंध रहे हों, तो सामाजिक ताने-बाने में उन्हें ‘कैरेक्टर लेस’ (चरित्रहीन) तक कह दिया जाता है। इस रूढ़िवादी और दकियानूसी मानसिकता पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शादी से पहले आपसी सहमति से बने ‘शारीरिक संबंध’ किसी भी व्यक्ति के चरित्र पर कभी भी कोई काला धब्बा नहीं हो सकते।

अदालत के अनुसार, ऐसे किसी भी संबंध को व्यक्ति के खराब नैतिक चरित्र का प्रमाण पत्र या सर्टिफिकेट नहीं माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में उम्मीदवार गजुला तिरुपति के पक्ष में अपना फैसला सुनाते हुए यह महत्वपूर्ण और दूरगामी बयान दिया है।

जानिए क्या है पूरा कानूनी विवाद
यह पूरा मामला एक ऐसे उम्मीदवार से जुड़ा है जिसका चयन पूरी पारदर्शी प्रक्रिया के बाद पुलिस कांस्टेबल के पद के लिए हुआ था। हालांकि, चयन सूची में नाम आने के बाद भी भर्ती बोर्ड ने उसकी उम्मीदवारी को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि वह अतीत में एक आपराधिक मामले में आरोपी रह चुका है। दर्ज मामले के अनुसार, उस उम्मीदवार पर आरोप था कि उसने अपने पड़ोस में रहने वाली एक युवती से शादी का झांसा देकर कई वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए थे, लेकिन बाद में उसने किसी दूसरी लड़की से विवाह कर लिया। हालांकि, यह आपराधिक मामला बहुत पहले यानी साल 2015 में ही लोक अदालत के माध्यम से दोनों पक्षों की आपसी सहमति और समझौते के बाद पूरी तरह से समाप्त हो चुका था, लेकिन विभाग ने इसे ही आधार बनाकर उसे अयोग्य ठहरा दिया।
सत्यापन फॉर्म में स्वयं दी थी जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि उम्मीदवार ने अपनी भर्ती प्रक्रिया के दौरान ईमानदारी का परिचय देते हुए चरित्र सत्यापन फॉर्म (वेरिफिकेशन फॉर्म) में इस पुराने आपराधिक मामले की पूरी और सत्य जानकारी स्वयं दर्ज की थी। उस पर विभाग से कोई भी तथ्य या सच्चाई छिपाने का कोई आरोप नहीं था।
इसके बावजूद, भर्ती बोर्ड की स्क्रीनिंग कमेटी ने उसे ‘नैतिक अधमता’ (मॉरल टरपिट्यूड) से जुड़े अपराध में संलिप्त मानते हुए पुलिस सेवा के लिए पूरी तरह से अयोग्य घोषित कर दिया था। इस पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि हालांकि नियोक्ताओं (इम्प्लॉयर्स) को किसी भी उम्मीदवार की उपयुक्तता और योग्यता का आकलन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उनका यह निर्णय पूरी तरह से तर्कसंगत होना चाहिए, न कि मनमाना। अदालत ने रेखांकित किया कि भर्ती बोर्ड ने बिना किसी ठोस कानूनी आधार के यह गलत मान लिया था कि लोक अदालत में हुआ समझौता अपराध स्वीकार करने के समान है।
बदलते सामाजिक परिवेश में विवाह-पूर्व संबंध सामान्य
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आज के आधुनिक और बदलते सामाजिक परिवेश का हवाला देते हुए एक अत्यंत प्रगतिशील टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आज के समय में दो वयस्कों के बीच विवाह-पूर्व संबंध होना एक सामान्य बात है। सिर्फ इसी एक आधार पर किसी भी नागरिक के चरित्र पर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की जा सकती और न ही उनके भविष्य को बर्बाद किया जा सकता है। माननीय जजों ने स्पष्ट किया कि दो अविवाहित बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के नैतिक चरित्र की धारणा बनाने का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। भारत का कोई भी कानून दो सहमति रखने वाले अविवाहित वयस्कों को अपनी व्यक्तिगत पसंद के अनुसार संबंध स्थापित करने या जीने से नहीं रोकता है।
हर प्रेम कहानी का अंत विवाह होना जरूरी नहीं
अपने फैसले को तार्किक रूप से समझाते हुए अदालत ने कहा कि यह जीवन का व्यावहारिक सच है कि हर प्रेम संबंध अनिवार्य रूप से विवाह के मुकाम तक नहीं पहुंचता। केवल इसलिए कि किसी रिश्ते का अंत शादी में नहीं हो सका, यह निष्कर्ष कतई नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को धोखा देने या छलने के इरादे से संबंध बनाए थे। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड की स्क्रीनिंग समिति के निर्णय को पूरी तरह से मनमाना, अवैध और अनुचित बताते हुए पीड़ित उम्मीदवार के पक्ष में अपना अंतिम फैसला सुनाया। इसके साथ ही, अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के पूर्व आदेश को बहाल रखा और संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि वे उम्मीदवार की नियुक्ति प्रक्रिया पर सकारात्मक रूप से पुनर्विचार करें।
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