Kuno National Park : कूनो नेशनल पार्क में चीतों ने बदला अपना स्वभाव, तेंदुओं के साथ अपनाई अनोखी टाइम-शेयरिंग रणनीति

Kuno National Park : मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए एक बेहद सकारात्मक और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। नामीबिया से भारत लाए गए चीते अब पूरी तरह से भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र में खुद को ढालने लगे हैं। अपनी जान बचाने और खूनी टकराव को टालने के लिए इन चीतों ने कूनो के अन्य बड़े शिकारियों, जैसे तेंदुए और लकड़बग्घों के साथ एक अनूठा तालमेल बिठा लिया है। पर्यावरण मंत्रालय की नवीनतम ‘एनुअल प्रोग्रेस रिपोर्ट’ के अनुसार, कूनो के वन्यजीवों ने अस्तित्व बचाने के लिए ‘टाइम-शेयरिंग’ का एक शानदार तरीका इजात किया है, जो उनकी बुद्धिमानी को दर्शाता है।

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कैमरा ट्रैप से हुआ ‘एक्टिविटी विंडो’ में बदलाव का खुलासा

कूनो और गांधी सागर अभयारण्य में लगाए गए हाई-टेक कैमरा ट्रैप्स की मॉनिटरिंग से पता चला है कि इन शिकारियों की ‘एक्टिविटी विंडो’ पूरी तरह से बदल गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही चीते, तेंदुए और लकड़बग्घे एक ही भौगोलिक क्षेत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उनका समय बिल्कुल अलग-अलग है। चीते अब मुख्य रूप से सुबह और शाम के उस समय अधिक सक्रिय होते हैं, जब तेंदुए या लकड़बग्घे वहां आसपास नहीं होते। इस रणनीतिक समय-विभाजन के कारण ये तीनों बड़े शिकारी आपस में टकराने से बच रहे हैं, जो कूनो के जंगल में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की एक नई मिसाल बन गया है।

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बहु-शिकारी तंत्र में चीतों का सफल अनुकूलन

सितंबर 2022 में जब नामीबिया से आठ चीते पहली बार भारत आए थे, तब वन्यजीव विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि शारीरिक रूप से कमजोर और कम आक्रामक होने के कारण चीते, तेंदुओं के वर्चस्व वाले जंगलों में कैसे जीवित रहेंगे। वर्तमान में मध्य प्रदेश में शावकों समेत कुल 53 चीते हैं। चूंकि चीते तेंदुओं की तरह भारी और आक्रामक नहीं होते, इसलिए उन्होंने सीधे टकराव की जगह ‘स्पेशियल डिस्ट्रीब्यूशन’ यानी जगह और समय बांटने की रणनीति अपनाई है। कूनो की कठिन परिस्थितियों में चीतों द्वारा अपनाई गई यह रणनीति उनकी अनुकूलन क्षमता और सर्वाइवल इंस्टिंक्ट को प्रमाणित करती है।

गुजरात में भी वन्यजीव प्रबंधन को लेकर प्रशासनिक हलचल

चीतों के सफल प्रबंधन के बीच पड़ोसी राज्य गुजरात से भी वन्यजीवों को लेकर एक बड़ी प्रशासनिक खबर सामने आई है। राज्य में इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को देखते हुए वन विभाग ने कड़ा कदम उठाया है। जून के महीने में गुजरात के विभिन्न जंगलों से करीब 30 शेरों को पकड़ा गया है। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, पकड़े गए शेरों में से 5 से 6 के ‘आदमखोर’ होने का संदेह है, जिन्हें फिलहाल हिरासत (कस्टडी) में रखकर निगरानी की जा रही है। वहीं, शेष शेरों को स्वास्थ्य जांच के बाद पुनः सुरक्षित जंगलों में वापस छोड़ दिया गया है।

भविष्य की राह: वन्यजीव संरक्षण की बदलती चुनौतियां

कूनो का सफल प्रयोग और गुजरात में शेरों के प्रति सतर्कता इस बात का प्रमाण है कि भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रमुखता दी जा रही है। कैमरा ट्रैप तकनीक और निरंतर मॉनिटरिंग के माध्यम से न केवल जानवरों के व्यवहार को समझा जा रहा है, बल्कि संघर्ष को कम करने के प्रभावी उपाय भी किए जा रहे हैं। चीतों का यह अनूठा ‘टाइम-शेयरिंग’ मॉडल आने वाले समय में अन्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकता है, जहां विविध प्रकार के मांसाहारी जीव एक साथ रहते हैं।

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Chandan Das

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