Kusum Farming : कुसुम की खेती से कमाई का मौका, जानिए बुवाई का सही समय और तरीका

कुसुम की खेती किसानों के लिए उपयोगी तिलहनी फसल मानी जाती है। इसकी बुवाई से लेकर सिंचाई, खाद और कटाई तक सही तकनीक अपनाना जरूरी है। सरकार की MSP में बढ़ोतरी के बाद कुसुम को लेकर किसानों की दिलचस्पी बढ़ी है। जानिए कुसुम की खेती का सही तरीका और इससे जुड़ी जरूरी जानकारी।

Kusum Farming : रबी सीजन में किसान ऐसी फसलों की तलाश करते हैं, जिनमें कम पानी की जरूरत हो और बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आमदनी की संभावना बने। कुसुम एक प्रमुख तिलहन फसल है, जिसकी खेती खासतौर पर कम पानी वाले और वर्षा आधारित क्षेत्रों में की जाती है। इसके बीजों में लगभग 24 से 36 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है। कुसुम के तेल का इस्तेमाल खाद्य तेल के अलावा साबुन, पेंट और वार्निश जैसे उत्पाद बनाने में भी किया जाता है।

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कुसुम की MSP में हुई 675 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ोतरी

केंद्र सरकार ने रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में बढ़ोतरी की है। कुसुम की MSP को 6,540 रुपये से बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इस तरह किसानों को पिछले MSP की तुलना में 675 रुपये प्रति क्विंटल अधिक मिलेंगे। छह प्रमुख रबी फसलों में कुसुम के MSP में सबसे अधिक बढ़ोतरी बताई गई है, जिससे इसकी खेती करने वाले किसानों का ध्यान इस ओर बढ़ सकता है।

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इन राज्यों में ज्यादा होती है कुसुम की खेती

देश में कुसुम की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में अधिक की जाती है। सरकार कम पानी वाले क्षेत्रों में तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। ऐसे में कुसुम उन किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है, जहां सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है और किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर रहते हैं।

सितंबर अंत से अक्टूबर तक करें कुसुम की बुवाई

कुसुम की बुवाई के लिए सितंबर के अंतिम दिनों से लेकर अक्टूबर के पहले सप्ताह तक का समय उपयुक्त माना जाता है। किसानों को बेहतर प्रबंधन के लिए इसकी बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार के बीच लगभग 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच करीब 25 सेंटीमीटर की दूरी रखना उचित माना जाता है। बीजों को लगभग 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई में बोया जा सकता है।

एक हेक्टेयर में 15 से 20 किलो बीज पर्याप्त

कुसुम की खेती के लिए बीज की मात्रा का सही इस्तेमाल भी जरूरी है। सामान्य तौर पर एक हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 15 से 20 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है। बुवाई से पहले खेत की अच्छी तैयारी करने और उचित दूरी पर बीज लगाने से पौधों की वृद्धि तथा फसल की देखभाल आसान हो सकती है। किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार बीज की मात्रा तय कर सकते हैं।

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बुवाई से पहले बीज उपचार करना जरूरी

कुसुम की अच्छी फसल के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार पर भी ध्यान देना चाहिए। कृषि सलाह के अनुसार प्रति किलोग्राम बीज में कैप्टान, थीरम या मैंकोजेब की करीब 3 ग्राम मात्रा से उपचार किया जा सकता है। खेत की तैयारी के दौरान प्रति हेक्टेयर लगभग 15 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाई जा सकती है।

खाद और सिंचाई का रखें विशेष ध्यान

रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में करीब 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की मात्रा बताई जाती है। कुसुम को कम पानी में भी उगाया जा सकता है। यदि सिंचाई उपलब्ध हो तो बुवाई के करीब 30 दिन बाद सिंचाई की जा सकती है। खेत में खरपतवार होने पर समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना भी जरूरी है।

130 से 140 दिन में तैयार हो जाती है फसल

कुसुम की फसल सामान्य परिस्थितियों में बुवाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है। असिंचित क्षेत्रों में करीब 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल सकता है, जबकि सिंचाई वाले खेतों में उपज 14 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंचने की संभावना रहती है। हालांकि वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, बीज की गुणवत्ता और खेती के प्रबंधन पर निर्भर करता है।

बढ़ी MSP से किसानों को मिल सकता है फायदा

कम पानी की जरूरत, तिलहन के रूप में उपयोगिता और बढ़ी हुई MSP को देखते हुए कुसुम रबी सीजन में किसानों के लिए एक विकल्प हो सकती है। हालांकि खेती शुरू करने से पहले किसान अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, बाजार की मांग और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह को ध्यान में रखें। सही तकनीक और समय पर फसल प्रबंधन से कुसुम की खेती में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

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Chandan Das

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