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Leh Earthquake : लद्दाख के लेह में तड़के महसूस किए गए भूकंप के झटके, रिक्टर स्केल पर 4.1 रही तीव्रता

Leh Earthquake :  केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख एक बार फिर कुदरती हलचल का केंद्र बना है। गुरुवार तड़के जब लेह के निवासी गहरी नींद में थे, तभी धरती के कंपन ने उन्हें जगा दिया। भारतीय समयानुसार सुबह 3 बजकर 54 मिनट पर लेह और उसके आस-पास के इलाकों में भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए। अचानक आए इस झटके के कारण लोगों में दहशत फैल गई और सुरक्षा की दृष्टि से बड़ी संख्या में लोग कड़ाके की ठंड के बावजूद अपने घरों से बाहर खुले मैदानों की ओर निकल आए। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) ने इस भूकंप की पुष्टि करते हुए बताया कि इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4.1 मापी गई है।

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जमीन के काफी नीचे था केंद्र: जान-माल के नुकसान से राहत

भूकंप की तीव्रता भले ही मध्यम श्रेणी की थी, लेकिन इसकी गहराई ने बड़े खतरे को टाल दिया। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के आंकड़ों के अनुसार, इस भूकंप का केंद्र जमीन की सतह से लगभग 150 किलोमीटर नीचे था। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, जब भूकंप का केंद्र अधिक गहराई पर होता है, तो सतह पर उसका विनाशकारी प्रभाव कम हो जाता है। यही कारण रहा कि इतनी तीव्रता के बावजूद अब तक लेह से किसी भी प्रकार के जान-माल के नुकसान या इमारतों में दरार आने की कोई आधिकारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

भूकंपों का सिलसिला: राजस्थान में भी दर्ज की गई थी हलचल

पिछले कुछ दिनों से भारत के विभिन्न हिस्सों में भूगर्भीय सक्रियता बढ़ी हुई देखी जा रही है। लद्दाख से पहले, बुधवार को राजस्थान के खैरताल तिजारा जिले में भी धरती कांपी थी। हालांकि राजस्थान में आए भूकंप की तीव्रता केवल 3.0 थी, लेकिन वह लद्दाख के मुकाबले अधिक चिंताजनक था क्योंकि उसका केंद्र जमीन से मात्र 3 किलोमीटर नीचे था। कम गहराई वाले भूकंप छोटे होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर तेज झटके महसूस कराते हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के अलग-अलग राज्यों में लगातार आ रहे ये झटके विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बने हुए हैं।

क्यों कांपती है धरती? समझिए भूकंप के पीछे का विज्ञान

भूकंप कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि पृथ्वी के भीतर चल रही निरंतर भौगोलिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। हमारी पृथ्वी की बाहरी सतह कई विशाल टुकड़ों में विभाजित है, जिन्हें ‘टेक्टोनिक प्लेट्स’ कहा जाता है। ये प्लेटें हमेशा बहुत धीमी गति से गतिमान रहती हैं। जब ये प्लेटें आपस में टकराती हैं, एक-दूसरे के ऊपर चढ़ती हैं या रगड़ खाकर खिसकती हैं, तो चट्टानों के बीच भारी तनाव (Stress) पैदा होता है। जब यह तनाव चट्टानों की सहने की क्षमता से अधिक हो जाता है, तो वे अचानक टूट जाती हैं या फिसल जाती हैं। इस प्रक्रिया में ऊर्जा का एक विशाल विस्फोट होता है, जो लहरों के रूप में सतह तक पहुंचता है और हमें भूकंप के रूप में महसूस होता है।

हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और सुरक्षा उपाय

लद्दाख और पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से ‘जोन 5’ और ‘जोन 4’ में आता है, जो सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट की ओर खिसक रही है, जिससे इस क्षेत्र में भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर निर्माण तकनीक और जागरूकता के जरिए इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। लोगों को सलाह दी जाती है कि भूकंप के समय घबराएं नहीं, बल्कि ‘झुको, ढको और पकड़ो’ (Drop, Cover, and Hold on) के सिद्धांत का पालन करें और बिजली के खंभों व ऊंची इमारतों से दूर रहें।

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