Litchi Crop
Litchi Crop : गर्मियों की आहट मिलते ही रसीली और मीठी लीची की याद आने लगती है। हालांकि अभी बाजार में लीची आने में वक्त है, लेकिन पेड़ों पर मंजर (फूल) आने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह समय लीची उत्पादकों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि अचानक बदलते मौसम के कारण बागानों में ‘स्टिंक बग’ (Stink Bug) नामक कीट का खतरा मंडराने लगता है। यह कीट इतना खतरनाक है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण न पाया जाए, तो यह पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है। बिहार कृषि विभाग ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए राज्य के किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है।
फरवरी से अप्रैल की शुरुआत का समय लीची के पौधों के लिए नाजुक होता है। बिहार के प्रमुख लीची उत्पादक जिले, विशेषकर मुजफ्फरपुर और पूर्वी चम्पारण के कई प्रखंडों में पिछले कुछ वर्षों से स्टिंक बग का भारी प्रकोप देखा जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, यह कीट सक्रिय होकर मंजरों पर हमला कर देता है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है। इन जिलों के किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपने बागानों की नियमित निगरानी करें।
स्टिंक बग की पहचान करना काफी आसान है। यह कीट गुलाबी या भूरे रंग का होता है और इससे एक विशिष्ट प्रकार की दुर्गंध (बदबू) आती है, जिसके कारण इसे ‘स्टिंक बग’ कहा जाता है। ये कीट हमेशा झुंड में हमला करते हैं। इसके नवजात (Nymphs) और वयस्क, दोनों ही पौधे के कोमल हिस्सों जैसे कलियों, पत्तियों, फूलों और विकसित हो रहे फलों के डंठल से रस चूसते हैं। रस चूसे जाने के कारण फूल और फल काले होकर गिरने लगते हैं, जिससे पेड़ की कोमल शाखाएं भी कमजोर पड़ जाती हैं।
15 अप्रैल तक का समय इस कीट की सक्रियता के लिए सबसे अनुकूल होता है। स्टिंक बग को लीची का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है क्योंकि इसकी प्रजनन क्षमता बहुत अधिक होती है। यदि बाग के एक भी पेड़ पर कुछ कीट जीवित बच जाते हैं, तो वे बहुत तेजी से अपनी आबादी बढ़ा लेते हैं और पूरे बागान को संक्रमित कर देते हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि प्रबंधन में चूक हुई तो यह कीट लीची की फसल को 80 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचा सकता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति होती है।
कृषि विभाग और राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर ने बचाव के लिए निम्नलिखित कदम उठाने की सलाह दी है:
यांत्रिक सफाई: कीट से प्रभावित पत्तियों और टहनियों को तुरंत काटकर जला देना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले।
हल्का झटका देना: सुबह के समय पेड़ की शाखाओं को हल्के हाथों से हिलाएं। इससे कीट नीचे गिर जाते हैं। जमीन पर गिरे हुए कीटों को इकट्ठा कर मिट्टी में दबा देना चाहिए।
कीटनाशक का प्रयोग: प्रभावी नियंत्रण के लिए 15 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव करें। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित रसायनों की सिफारिश की है:
थियाक्लोप्रिड 21.7% एस.सी. (0.5 मिली/लीटर) या लैम्ब्डा-साइहलोथ्रिन 5% ई.सी. (1.0 मिली/लीटर)।
फिप्रोनिल 5% एस.सी. (1.5 मिली/लीटर) का प्रयोग भी काफी कारगर साबित होता है।
लीची की गुणवत्ता और बेहतर पैदावार के लिए किसानों को केवल रासायनिक छिड़काव पर निर्भर रहने के बजाय बागान की स्वच्छता पर भी ध्यान देना होगा। सही समय पर की गई पहचान और कृषि विभाग के सुझावों का पालन करके ही बिहार की विश्वप्रसिद्ध शाही लीची को बचाया जा सकता है।
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