Magh Mela Controversy
Magh Mela Controversy: उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शासन और प्रशासन के रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। बुधवार, 21 जनवरी को मीडिया से बात करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि जिस तरह से संतों को अपमानित किया जा रहा है और उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, वह समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि संतों के मान-सम्मान पर चोट की जाएगी, तो इसके खिलाफ संघर्ष करना अनिवार्य हो जाएगा ताकि भविष्य में कोई भी प्रशासन ऐसी गलती दोहराने का साहस न कर सके।
शंकराचार्य ने प्रशासन के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न तो अनशन पर हैं और न ही किसी पारंपरिक धरने पर बैठे हैं। उनका विरोध आत्मसम्मान की रक्षा के लिए है। उन्होंने घोषणा की कि जब तक उन्हें ‘ससम्मान स्नान’ की अनुमति नहीं मिल जाती, तब तक वे अपने शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे गंगा-जमुना का बहिष्कार नहीं कर रहे हैं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद उन लोगों का विरोध कर रहे हैं जो संतों की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। उनका कहना था कि जब अपमान को सम्मान में बदला जाएगा, तभी वे अपने स्थान पर वापस लौटेंगे।
राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा करते हुए शंकराचार्य ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम लेकर सीधे सवाल दागे। उन्होंने पूछा कि “यदि इस विवाद के बीच अखिलेश यादव फोन करके हाल-चाल ले सकते हैं, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फोन क्यों नहीं करते?” उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पर भी तंज कसते हुए कहा कि जो लोग खुद को हिंदुओं का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं, उन्हें इस घटनाक्रम से पीड़ा क्यों नहीं हो रही है? शंकराचार्य ने राजनेताओं के दोहरे मापदंडों पर हमला करते हुए कहा कि जब नेता धर्म की बात करते हैं तो उसे सही माना जाता है, लेकिन जब एक शंकराचार्य शास्त्र सम्मत बात करता है, तो उसे गलत ठहरा दिया जाता है।
शंकराचार्य ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके पास अपमानजनक व्यवहार की पूरी रिकॉर्डिंग मौजूद है। उन्होंने दावा किया कि माघ मेले में त्रिवेणी मार्ग हमेशा से उनके लिए आरक्षित रहा है और यह उनका स्थायी पता है, लेकिन इस बार जान-बूझकर उन्हें निशाना बनाया गया। उनके अनुसार, यह पूरी घटना कोई इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन्हें अपमानित करने की योजना बनाई गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि जो लोग अपनी गलतियों के लिए माफी नहीं मांगेंगे, उन्हें अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ेगा।
अंत में, शंकराचार्य ने आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि वे स्वयं किसी का अहित नहीं करेंगे, लेकिन प्रकृति और कर्म का सिद्धांत अटल है। उन्होंने कहा कि जो लोग धर्म की मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं, उन्हें उसका परिणाम स्वयं भोगना होगा। प्रयागराज की संगम रेती पर छिड़ा यह विवाद अब केवल धार्मिक नहीं रह गया है, बल्कि इसमें राजनीतिक रंग भी घुल गया है। भक्तों और अनुयायियों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी है कि वह शंकराचार्य के सम्मान को बहाल करने के लिए क्या प्रयास करती है।
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