धर्म

Mahabharat war : महाभारत युद्ध से दूर रहे थे ये चार शक्तिशाली योद्धा, जानिए असली वजह

Mahabharat war :  सनातन इतिहास और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, महाभारत का युद्ध द्वापर युग के संधिकाल यानी अंत में लड़ा गया था। यह ऐतिहासिक और प्रलयंकारी महासंग्राम कुरुक्षेत्र की पवित्र एवं ऐतिहासिक भूमि पर न्यायप्रिय पांडवों और महत्वाकांक्षी कौरवों के बीच छिड़ा था। इस महायुद्ध की विभीषिका इतनी भयावह थी कि इसमें भारतवर्ष के असंख्य शूरवीरों, राजाओं और महारथियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों का दृढ़ मत है कि मानव इतिहास में महाभारत से ज्यादा भयंकर, विनाशकारी और रक्तरंजित युद्ध आज तक पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं हुआ। यह महायुद्ध कुल 18 दिनों तक निरंतर चला था, जिसमें दोनों पक्षों को भारी जन-धन की हानि उठानी पड़ी थी। अंततः, इस धर्मयुद्ध में असत्य के प्रतीक कौरवों का समूल नाश हुआ और सत्य व न्याय के पथ पर चलने वाले पांडवों को पूर्ण विजय प्राप्त हुई, क्योंकि स्वयं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण और साक्षात धर्म उनके पक्ष में खड़े थे।

कुरुक्षेत्र की रणभूमि सजी, लेकिन चार महारथियों ने युद्ध से बनाए रखी दूरी

इस महायुद्ध की घोषणा होते ही कौरवों और पांडवों, दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने के लिए आर्यावर्त के सभी शुभचिंतकों, मित्र राजाओं और सगे-संबंधियों को कुरुक्षेत्र पहुंचने का निमंत्रण भेजा था। भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, महाबली अर्जुन, दानवीर कर्ण और वीर घटोत्कच जैसे अनगिनत पराक्रमी योद्धाओं ने इस कुरुक्षेत्र की रणभूमि को सुशोभित किया। लगभग समस्त आर्यावर्त इस युद्ध में किसी न किसी पक्ष से लड़ रहा था।

परंतु, इस सबके बीच इतिहास में चार ऐसे भी परम शक्तिशाली और अद्वितीय योद्धा हुए, जो इस महाविनाशकारी युद्ध की विभीषिका से पूरी तरह दूर रहे। उन्होंने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में शस्त्र न उठाने का दृढ़ संकल्प लिया था। आइए, इतिहास के पन्नों को पलटकर इन चार विशिष्ट चरित्रों और उनके युद्ध में शामिल न होने के मुख्य कारणों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

महात्मा विदुर का तटस्थ भाव, दुर्योधन के अपमान के कारण त्यागी रणभूमि

हस्तिनापुर के महामंत्री और महाराज धृतराष्ट्र के परम बुद्धिमान सलाहकार महात्मा विदुर ने महाभारत के युद्ध से पूरी तरह दूरी बना ली थी। वे कुरुक्षेत्र की भूमि पर किसी भी पक्ष से हथियार उठाए बिना, केवल एक तटस्थ साक्षी और गवाह बनकर इस भयानक विनाश को देखते रहे। विदुर जी वास्तव में साक्षात धर्मराज (यमराज) के अवतार थे और उनका पूरा जीवन सदैव सत्य, नीति और मर्यादा के प्रति समर्पित था।

वे भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन और उसके सहयोगी पूरी तरह से अधर्म और पाप के रास्ते पर चल रहे हैं, जिसका अंत सर्वनाश ही है। जब युद्ध तय हो गया, तब दुर्योधन ने भरे दरबार में महात्मा विदुर की न्यायसंगत बातों को सुनने के बजाय उनका घोर अपमान कर दिया था। इसी आत्मसम्मान को ठेस पहुंचने और अधर्म का साथ न देने की इच्छा के कारण विदुर जी ने अपने पद और धनुष का परित्याग कर युद्ध से अलग रहने का फैसला किया।

बलराम जी का धर्मसंकट, दुर्योधन के प्रति गुरु-मोह ने रोका कदम

महाभारत युद्ध में जहां एक तरफ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी की भूमिका स्वीकार कर पांडवों का मार्गदर्शन किया, वहीं उनके सगे बड़े भाई और गदा युद्ध के प्रकांड विद्वान बलराम जी ने खुद को इस युद्ध से पूरी तरह अलग रखा। बलराम जी के सामने एक बहुत बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया था। एक ओर पांडव उनके अत्यधिक प्रिय और परम हितैषी थे, तो दूसरी ओर कौरवों का मुखिया दुर्योधन उनका अत्यंत प्रिय शिष्य था, जिसने उनसे ही गदा युद्ध की बारीकियां सीखी थीं। दोनों पक्षों के प्रति समान स्नेह और गुरु-शिष्य के संबंध के कारण बलराम जी किसी एक का पक्ष लेकर दूसरे का संहार नहीं करना चाहते थे। इस वैचारिक द्वंद्व और धर्मसंकट से बचने के लिए उन्होंने युद्ध के समय तीर्थयात्रा पर जाने का मार्ग चुना और कुरुक्षेत्र से दूर रहे।

उडुपी के राजा का अनूठा संकल्प, युद्ध के मैदान में संभाली रसोई की कमान

वर्तमान समय में भारत के कर्नाटक राज्य में स्थित उडुपी क्षेत्र के तत्कालीन राजा भी इस महायुद्ध के दौरान हथियारों की लड़ाई से दूर रहे थे। जब उडुपी के राजा अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचे, तो उन्होंने दोनों पक्षों की विशाल सेनाओं को देखकर भगवान श्रीकृष्ण से एक अनोखा प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि युद्ध लड़ने वाले तो बहुत हैं, लेकिन इन लाखों सैनिकों के लिए भोजन का प्रबंध करने वाला कोई नहीं है।

श्रीकृष्ण की सहमति और निर्देश पर उडुपी के राजा ने युद्ध में शामिल होने के बजाय दोनों पक्षों के सैनिकों के लिए प्रतिदिन भोजन तैयार करने की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। उनकी सूझबूझ ऐसी थी कि युद्ध में जितने सैनिक हर दिन वीरगति को प्राप्त होते थे, अगले दिन ठीक उतने ही लोगों का भोजन बनता था, जिससे अन्न का एक भी दाना कभी बर्बाद नहीं हुआ।

रुक्मी का प्रचंड अहंकार बना बाधक, अर्जुन ने ठुकरा दिया था प्रस्ताव

श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी के सगे भाई और भोजकट के राजा रुक्मी की गिनती उस काल के सबसे पराक्रमी और शक्तिशाली धनुर्धारियों में की जाती थी। उनके पास एक अत्यंत दिव्य धनुष था, जिसके बल पर वे इस महायुद्ध में पांडवों की सहायता कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। रुक्मी अपनी विशाल सेना लेकर पांडवों के शिविर में पहुंचे, परंतु वे वहां सहयोग की भावना से नहीं, बल्कि अपने अटूट पराक्रम और शक्ति का भयंकर अहंकार प्रदर्शन करने लगे।

उन्होंने पांडवों से कहा कि यदि वे चाहें तो वह अकेले ही पूरी कौरव सेना को कुछ ही दिनों में नष्ट कर सकते हैं। रुक्मी के इस घमंडी और अपमानजनक स्वभाव को देखकर महाबली अर्जुन ने उनके इस प्रस्ताव को तुरंत और पूरी तरह से ठुकरा दिया। इस आत्ममुग्धता और अपमान के कारण रुक्मी न तो पांडवों की तरफ से लड़ सके और न ही कौरवों की तरफ से, और उन्हें मजबूरन युद्ध से दूर रहना पड़ा।

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