Mainpat Bauxite Mining
Mainpat Bauxite Mining: छत्तीसगढ़ के शिमला कहे जाने वाले सरगुजा के मैनपाट इलाके में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच एक बड़ा टकराव सामने आया है। मैनपाट के बरिमा गांव में ग्रामीणों ने अपनी निजी जमीनों से बिना मुआवजा दिए बाक्साइट निकालने वाली एक निजी कंपनी के काम को पूरी तरह रोक दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन और कंपनी उनकी जमीनों का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन बदले में मिलने वाली उचित आर्थिक सहायता या मुआवजे की प्रक्रिया को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। “जब तक मुआवजा नहीं, तब तक खनन नहीं” के नारे के साथ ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जमीन पर किसी भी अवैध गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे।
जानकारी के अनुसार, बरिमा क्षेत्र में बाक्साइट खदान की लीज छत्तीसगढ़ स्टेट माइनिंग डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (CMDC) को दी गई थी। हालांकि, सीएमडीसी ने स्वयं उत्खनन करने के बजाय यह कार्य एक निजी कंपनी ‘मां कुदरगढ़ी एलुमिना एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड’ को सौंप दिया। कंपनी पिछले लगभग एक माह से इस क्षेत्र में सक्रिय थी और मशीनों के जरिए बाक्साइट का उत्खनन कर रही थी। विवाद तब गहराया जब ग्रामीणों को पता चला कि उनकी जमीनों पर उत्खनन का काम तो शुरू हो गया है, लेकिन उनके बैंक खातों में मुआवजे की राशि का कोई अता-पता नहीं है।
बिना मुआवजे के खनन की खबर फैलते ही जिला पंचायत सदस्य रतनी नाग बरिमा गांव पहुंचीं। ग्रामीणों ने उन्हें अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि किस तरह उनकी मेहनत की कमाई और आजीविका के साधन यानी जमीन को कंपनी ने अपने कब्जे में ले लिया है। इसके बाद रतनी नाग के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण खदान स्थल पहुंचे और वहां चल रहे काम को तुरंत बंद करा दिया। आक्रोशित ग्रामीणों ने कंपनी के कर्मचारियों को वहां से भगा दिया और चेतावनी दी कि यदि बिना मुआवजा दिए दोबारा मशीनें चलीं, तो वे कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर होंगे।
हंगामे के दौरान ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने दो-टूक कहा कि यदि उनकी मांगों को अनसुना किया गया और बिना भुगतान के उत्खनन फिर से शुरू हुआ, तो वे कंपनी की मशीनों में आग लगाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। ग्रामीणों ने इस पूरी अव्यवस्था और विरोध प्रदर्शन की जानकारी तत्काल सीएमडीसी के उच्च अधिकारियों को दी। हालांकि, ग्रामीणों का आरोप है कि सूचना मिलने के बावजूद कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर वस्तुस्थिति का जायजा लेने नहीं पहुंचा, जिससे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है।
बरिमा खदान के जिस क्षेत्र में बाक्साइट का उत्खनन किया जा रहा है, वहां की अधिकांश जमीनें आदिवासी समुदाय की हैं। आदिवासी वर्ग की जमीन होने के कारण यह मामला और भी संवेदनशील हो गया है। जिला पंचायत सदस्य रतनी नाग ने कहा कि नियमों के अनुसार, आदिवासी जमीन का अधिग्रहण और उस पर उत्खनन बिना ग्राम सभा की अनुमति और उचित मुआवजे के नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को ‘अवैध’ करार देते हुए कहा कि आदिवासियों के अधिकारों का हनन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बताया जा रहा है कि बरिमा में सीएमडीसी की लीज की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी, जिसे हाल ही में एक्सटेंशन (विस्तार) दिलाया गया है। सवाल यह उठ रहा है कि लीज की अवधि बढ़ाते समय क्या प्रभावित ग्रामीणों के मुआवजे की शर्तों को पूरा किया गया? बिना किसी पूर्व सूचना या भुगतान के सीएमडीसी ने निजी कंपनी को जमीनें कैसे सौंप दीं? फिलहाल, बरिमा में बाक्साइट का उत्खनन ठप पड़ा है और ग्रामीण अपनी जमीन की रक्षा के लिए मुस्तैद हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गतिरोध को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाता है।
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