Manoj Naravane on China : पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल मनोज नरवणे ने भारत की सुरक्षा चुनौतियों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की ओर से लगातार बने आतंकवाद के खतरे के कारण भारत का सुरक्षा ध्यान लंबे समय से पश्चिमी सीमा पर केंद्रित रहा है। हालांकि, आने वाले वर्षों और दीर्घकाल में चीन भारत के लिए कई क्षेत्रों में प्रमुख प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर सकता है। उन्होंने चीन के लिए ‘दुश्मन’ शब्द इस्तेमाल करने से परहेज करते हुए उसे ‘प्रतिस्पर्धी’ बताया।
चीन और पाकिस्तान से अलग-अलग तरह की चुनौती
अपनी नई किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज’ के विमोचन के मौके पर नरवणे ने भारत की रणनीतिक स्थिति पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ युद्ध लड़ चुका है और दोनों देशों के साथ सीमा संबंधी विवाद अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। हालांकि, दोनों देशों से मिलने वाली चुनौतियों का स्वरूप एक-दूसरे से काफी अलग है।
चीन को लेकर नरवणे ने क्यों जताई चिंता
नरवणे के मुताबिक पाकिस्तान भारत के लिए तत्काल सुरक्षा चुनौती बना हुआ है, जिसका प्रमुख कारण आतंकवाद और सीमा पार से मिलने वाला समर्थन है। इसके विपरीत चीन की चुनौती लंबे समय में अधिक व्यापक हो सकती है। उनका मानना है कि चीन केवल सैन्य क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करेगा। यही वजह है कि भारत को भविष्य की रणनीति बनाते समय चीन को गंभीरता से लेना होगा।
‘शत्रु’ नहीं, ‘प्रतिस्पर्धी’ शब्द का इस्तेमाल
जनरल नरवणे ने चीन को लेकर अपनी भाषा को लेकर भी स्पष्टता दिखाई। उन्होंने जानबूझकर चीन के लिए ‘प्रतिस्पर्धी’ शब्द इस्तेमाल किया और ‘शत्रु’ कहने से बचने की बात कही। उनका संकेत था कि दोनों देशों के बीच मतभेद और सीमा विवाद जरूर हैं, लेकिन इन्हें केवल टकराव के नजरिए से देखने के बजाय व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इससे भारत के लिए कूटनीतिक विकल्प भी खुले रह सकते हैं।
बातचीत से मतभेद सुलझाने पर जोर
पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि चीन के साथ मौजूद लंबे समय से चले आ रहे विवादों को बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों के जरिए हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक किसी भी समस्या के समाधान के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल पहली पसंद नहीं होना चाहिए। बल प्रयोग को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत को बातचीत के रास्ते से समाधान तलाशने की दिशा में लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।
सैन्य ताकत मजबूत रखना भी जरूरी
हालांकि, बातचीत पर जोर देने के साथ नरवणे ने भारत की सैन्य तैयारियों को कमजोर करने के पक्ष में भी नहीं दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि संभावित सैन्य दुस्साहस को रोकने के लिए देश के पास मजबूत और विश्वसनीय सैन्य प्रतिरोधक क्षमता होना आवश्यक है। यानी भारत को एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी रखनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर अपनी रक्षा क्षमताओं को भी लगातार मजबूत करना होगा।
दोनों सीमाओं पर सतर्क रहने की जरूरत
नरवणे ने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान और चीन दोनों ही भारत के सुरक्षा रडार पर बने रहेंगे। दोनों देशों के साथ सीमा विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और अतीत में भारत दोनों के साथ युद्ध भी लड़ चुका है। इसलिए भारत को अपनी पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। पाकिस्तान से आतंकवाद और चीन से दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, दोनों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना होगा।
2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहे नरवणे
जनरल मनोज नरवणे 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के प्रमुख रहे। उनके कार्यकाल के दौरान भारत की सुरक्षा नीति में चीन और पाकिस्तान दोनों से जुड़ी चुनौतियां महत्वपूर्ण रही थीं। उनके अनुभव के आधार पर चीन को लेकर दिया गया यह आकलन भारत की भविष्य की रक्षा और विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका संदेश साफ है कि भारत को संवाद, कूटनीति और मजबूत सैन्य तैयारी के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।
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